नज़्र (मन्नत) के प्रकार और उनके अहकाम का सारांश
नज़्र (मन्नत) यह है कि कोई मुकल्लफ़ (शरई नियमों की बाध्यता के योग्य व्यक्ति) अपने ऊपर किसी ऐसे काम को अनिवार्य कर ले जो पहले उस पर अनिवार्य नहीं था, चाहे वह तुरंत लागू हो या किसी शर्त के साथ जुड़ा हो। शरीअत-सम्मत नज़्र को पूरा करना वाजिब (अनिवार्य) है, जिसका प्रमाण अल्लाह तआला का यह कथन है : ثم ليقضوا تفثهم وليوفوا نذورهم “फिर वे अपना मैल-कुचैल दूर करें तथा अपनी मन्नतें पूरी करें।” (सूरतुल्-ह़ज्ज : 29)। नज़्र के कई प्रकार हैं : 1- वह नज़्र जिसे पूरा करना वाजिब है और वह आज्ञाकारिता की नज़्र है। 2- वह नज़्र जिसे पूरा करना जायज़ नहीं है, बल्कि उसमें क़सम का कफ़्फ़ारा देना होता है और वह अवज्ञा की नज़्र है। हर वह नज़्र जो किसी नस (शरीअत के स्पष्ट प्रमाण) से टकराती हो। तथा वह नज़्र जिसका क़सम के कफ़्फ़ारा के अलावा कोई हुक्म नहीं। वह नज़्र जिसमें नज़्र मानने वाले को नज़्र पूरी करने या क़सम का कफ़्फ़ारा देने का विकल्प होता है।