एक माँ अपने छोटे बच्चों को इस्लाम से कैसे परिचित कराए और उनके दिलों में इसके प्रति प्रेम कैसे पैदा करे?

प्रश्न 101752

मैंने - अल्हम्दुलिल्लाह - इस्लाम धर्म स्वीकार किया है, और मेरे तीन बच्चे हैं। मैं एक ईसाई परिवार से आती हूँ, जिसने मेरे मुसलमान बनने को "सहन" कर लिया है। मेरा प्रश्न यह है कि : मैं अपने बच्चों को बिना किसी दबाव के इस्लाम के बारे में कैसे समझाऊँ?  मेरा एक बेटा 11 साल का है, दूसरा बेटा 8 साल का है, और एक बेटी 5 साल की है।

उत्तर का पाठ

हर प्रकार की प्रशंसा एवं गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दुरूद व सलाम की वर्षा हो अल्लाह के रसूल पर। इसके बाद :

प्रथम :

हम अल्लाह तआला की प्रशंसा एवं गुणगान करते हैं जिसने आपको इस्लाम धर्म स्वीकार करने की तौफीक़ दी। हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह आपको इस्सलाम पर सुदृढ़ रखे और आपके परिवार को भी इस धर्म में प्रवेश करने के लिए मार्गदर्शन करे।

हम आपको सलाह देते हैं कि उन्हें सर्वोत्तम तरीके से मार्गदर्शन करने और निर्देशन देने में लापरवाही और आलस्य न बरतें। हो सकता है कि अल्लाह तआला आपके दिल को उनके इस्लाम धर्म अपनाने से ख़ुश कर दे और उनके अच्छे कर्मों के फल के समान सवाब आपको भी मिले।

दूसरा :

आपने अपने बच्चों के बारे में और उन्हें इस्लाम के अनुसार पालने के तरीके के बारे में सवाल करके बहुत अच्छा किया। अल्लाह तआला ने माता-पिता पर अपने बच्चों के पालन-पोषण की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी डाली है।

अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि उन्होंने कहा : मैंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को यह फरमाते हुए सुना : "तुममें से प्रत्येक व्यक्ति संरक्षक और ज़िम्मेदार है, और तुममें से प्रत्येक व्यक्ति से उसकी प्रजा के विषय में पूछताछ की जाएगी। शासक एक संरक्षक है और उससे उसकी प्रजा के विषय में पूछताछ की जाएगी। और एक पुरुष अपने परिवार का संरक्षक है और उससे उनके विषय में पूछताछ की जाएगी। और एक महिला अपने पति के घर की संरक्षक है और उससे उसके विषय में पूछताछ की जाएगी।” इस हदीस को बुख़ारी (हदीस संख्या : 853) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1829) ने रिवायत किया है।

इब्ने क़य्यिम (रहिमहुल्लाह) ने फरमाया :

"जिस व्यक्ति ने अपने बच्चे को लाभदायक ज्ञान देने में लापरवाही की और उसे यूँ ही बेकार छोड़ दिया, तो उसने अपने बेटे के साथ अत्यंत बुरा व्यवहार किया। वास्तव में अधिकांश बच्चों का बिगड़ना उनके माता-पिता की ओर से लापरवाही और उपेक्षा और उन्हें धार्मिक कर्तव्यों और सुन्नतों की शिक्षा न देने के कारण होता है। इस तरह उन्होंने बच्चों को छोटी उम्र में ही बर्बाद कर दिया, जिससे न तो वे स्वयं अपने लिए लाभकारी बन सके और न ही बड़े होकर अपने माता-पिता को लाभ पहुँचा सके।"

"तोह़फ़तुल मौदूद" (पृष्ठ 229)

तीसरा :

हम आपको अपने बच्चों को इस्लाम के बारे में सिखाने और उससे प्रेम करने पर प्रशिक्षित करने के बारे में जो सलाह देते हैं, उनमें से कुछ ये हैं :

1-उन्हें अरबी भाषा से जोड़ें और उनके दिलों में इसके प्रति प्रेम पैदा करें; क्योंकि यह इस्लाम को समझने और उससे प्रेम करने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

2-अपने बच्चों को उन्हीं की उम्र के ऐसे मुस्लिम दोस्तों से परिचित करवाएँ जो इस्लाम के अनुष्ठानों का पालन करने वाले हों। तथा ज़रूरी है कि ये दोस्त अच्छे चरित्र और धार्मिकता वाले हों; ताकि आपके बच्चे उनसे प्रभावित हों तथा वे अपनी धर्मपरायणता, इस्लामी शरीयत के प्रति प्रतिबद्धता और अपने माता-पिता के साथ व्यवहार में उनके लिए एक आदर्श बन सकें। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "अच्छे साथी और बुरे साथी की मिसाल कस्तूरी बेचने वाले और लोहार की धौंकनी की तरह है। कस्तूरी बेचने वाले से या तो आप ख़रीद लेंगे, या उसकी खुशबू सूंघेंगे, लेकिन लोहार की धौंकनी तुम्हारे शरीर या कपड़ों को जला देगी, या तुम्हें उससे दुर्गंध आएगी।" इस हदीस को बुखारी (हदीस संख्या : 1995) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2628) ने रिवायत किया है।

3- पुरुषों को नमाज़ पढ़ने और ज्ञान की मंडलियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करके उनके दिलों में मस्जिद के महत्व को स्थापित करें। बेहतर होगा कि जब भी वे इन मंडलियों में कोई चरण पूरा कर लें, तो आप उन्हें उपहार और पुरस्कार देकर प्रोत्साहित करें। इसमें कोई बुराई नहीं कि आप उन्हें अल्लाह के घरों और नमाज़ से प्रेम करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उनके साथ मस्जिद जाएँ। यदि मस्जिद जाना संभव न हो, चाहे दूरी के कारण हो या रास्ते के सुरक्षित न होने की वजह से, तो आप घर पर ही उन्हें समय पर नमाज़ सिखाने में लापरवाही न करें। जबकि आपको सात साल की उम्र के बच्चों को नमाज़ सिखाने का अनिवार्य रूप से आदेश दिया गया है। इस उम्र से पहले उन्हें नमाज़ सिखाई जा सकती है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : "अपने बच्चों को सात साल की उम्र में नमाज़ पढ़ने का हुक्म दो, और अगर वे दस साल की उम्र में नमाज़ न पढ़ें तो उन्हें (हल्के से) मारो, और (इस उम्र में) उनके सोने के बिस्तरों को अलग कर दो।"। इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 495) ने रिवायत किया, और अल-अल्बानी ने इसे "सहीह अबू दाऊद" में सही ठहराया।

4- उन्हें सुंदर और मन को भाने वाली आवाज़ों में पवित्र क़ुरआन सुनाया जाए, ताकि क़ुरआन का प्रभाव उनके दिलों में गहराई से उतर सके। अल्लाह की किताब मानव जाति के लिए मार्गदर्शन और रोशनी की किताब है, जो उनके रास्ते को रोशन करती है और अल्लाह की अनुमति से उन्हें सीधे मार्ग पर सुदृढ़ रखती है।"

5- इस्लामी मूल्यों (इस्लामी रंगत) से युक्त कार्टून फ़िल्में देखने से बच्चों को यह अवसर मिलता है कि वे उनमें दिखाई और सुनाई देने वाली बातों की तुलना अन्य प्रकार की फ़िल्मों से करें। यहाँ, अंतर स्पष्ट करने और इस तथ्य पर प्रकाश डालने में माता-पिता (और शिक्षकों) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस्लाम लोगों को अच्छाई करने, पारिवारिक रिश्ते बनाए रखने, दयालु और कृपालु होने के लिए प्रोत्साहित करता है, साथ ही बुराई, मनमुटाव, भ्रष्टाचार और क्रूरता के खिलाफ चेतावनी भी देता है।

6- उनकी उम्र के अनुसार, उन्हें उन इस्लामी वेबसाइटों से परिचित कराएँ जो उनके लिए फायदेमंद हों। ध्यान रखें कि उन्हें इन साइटों पर बेरोकटोक प्रवेश न करने दें; बल्कि, यह आपके माध्यम से होना चाहिए।

7- एक और बात जिस पर आपको ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह आपके लक्ष्यों को प्राप्त करने में आपकी मदद करेगी: आप उन्हें उम्रा कराने और अल्लाह के पवित्र घर (काबा) की ज़ियारत करवाने के लिए ले जाएँ। क्योंकि यह अनुभव युवाओं के दिलों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे यह बड़ों के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत होता है।

8- बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार सरल भाषा में आस्था के बुनियादी सिद्धांतों से अवगत कराना चाहिए — जैसे कि अल्लाह तआला एक है, वह उन्हें सुनता और देखता है, और यह कि वह उन लोगों को पुरस्कृत करता है जो अच्छा व्यवहार करते हैं और इस्लाम के नियमों का पालन करते हैं।

अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की कम उम्र ने पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इस बात से नहीं रोका कि आप उन्हें तौहीद (एकेश्वरवाद) और आस्था (अक़ीदा) के बारे में प्रभावशाली बातें बताएँ।

इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है कि उन्होंने कहा : “मैं एक दिन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पीछे सवारी पर था। आप ने मुझसे फरमाया : “ऐ प्यारे बच्चे! मैं तुम्हें कुछ बातें सिखा रहा हूँ ; अल्लाह के आदेशों की रक्षा करो, वह तुम्हारी रक्षा करेगा, अल्लाह के अधिकारों का ध्यान रखो, तुम उसे अपने सामने पाओगे। जब तुम कुछ माँगो, तो केवल अल्लाह से माँगो। जब तुम मदद माँगो, तो केवल अल्लाह से मदद माँगो। और जान लो – अगर पूरी उम्मत (दुनिया के सारे लोग) भी इकट्ठा होकर तुम्हें कोई फायदा पहुँचाना चाहें, तो वे उतना ही फायदा पहुँचा सकते हैं, जितना अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है। और अगर वे सब मिलकर तुम्हें कोई नुकसान पहुँचाना चाहें, तो वे तुम्हें उससे अधिक नुकसान नहीं पहुँचा सकते, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख रखा है। कलम उठा लिए गए और पन्ने सूख गए।” इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2516) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इसे 'सहीह तिर्मिज़ी' में सहीह कहा है।"

9- उन्हें पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और उनके महान साथियों के जीवन के बारे में उनकी उम्र के अनुसार कहानियाँ सुनाएँ, ताकि वे जान सकें कि वे सर्वश्रेष्ठ धर्म, सर्वश्रेष्ठ पैगंबर और सर्वश्रेष्ठ उम्मत से संबंध रखते हैं।

इस विषय की महत्ता को समझने के लिए प्रश्न संख्या (21215) और (22496) के उत्तर देखें।

10- उन्हें इस्लामी स्कूलों में दाख़िला दिलाएँ और उन्हें भ्रष्ट स्कूलों से दूर रखें। इस्लामी स्कूल उनके अक़ीदा और व्यवहार का ध्यान रखते हैं, और सबसे अच्छे स्कूल का चुनाव आपके अपने विवेक पर निर्भर है।

आपको दो महत्वपूर्ण बातों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए:

पहली बात : दुआ करें कि अल्लाह उन्हें सुधार दे, उनका मार्गदर्शन करे और उन्हें सफलता प्रदान करे। क्योंकि आपकी दुआ उन्हें सुधारने और उनका मार्गदर्शन करने का एक बेहतरीन ज़रिया है। इसलिए इसकी उपेक्षा न करें या इसके महत्व को कम न आँकें।

दूसरी बात : आप उनके साथ अपने अच्छे व्यवहार और उनके प्रति अपनी दया व करुणा में उनके लिए एक अच्छा आदर्श बनें। यह केवल “माँ” होने के नाते नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की शरीअत के प्रति समर्पित एक मुसलमान होने के नाते भी होना चाहिए।

हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह आपको उस भलाई में कामयाबी दे जिसके लिए आप कोशिश कर रही हैं, और आपके बच्चों को वह हिदायत प्रदान करे जिसे अल्लाह पसंद करता है और जिससे वह राज़ी होता है।

और अधिक जानकारी के लिए इन प्रश्नों के उत्तर देखें : (20064), (4237) – यह महत्वपूर्ण है –, (129896) और (10211)।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

संदर्भ

बच्चों का पालन पोषण और शिक्षण

स्रोत

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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