अरबी भाषा में “कौसर” शब्द अत्यधिक बहुतायत और प्रचुरता के अर्थ में प्रयोग होता है।
लेकिन इस्लामी शरीयत की शब्दावली में अल-कौसर के दो अर्थ हैं :
पहला अर्थ :
यह जन्नत में एक नहर है, जिसे अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को प्रदान किया। यही अर्थ अल्लाह तआला के इस कथन में अभिप्रेत है : (إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ) "(ऐ नबी!) हमने आपको कौसर प्रदान किया।" (सूरत अल-कौसर : 1), जैसाकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने स्वयं इसकी यही व्याख्या की है, जैसा कि इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह (हदीस संख्या : 607) में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्होंने कहा : एक बार हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास बैठे थे, तो आपने हल्की सी झपकी ली, फिर मुस्कुराते हुए सिर उठाया। हमने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! आपको किस बात ने हंसाया? आपने फरमाया : "मुझ पर एक सूरत उतरी है।" फिर आपने पढ़ी : "बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। इन्ना आतैनाकल कौसर..." सूरत के अंत तक। इसके बाद आपने पूछा : "क्या तुम जानते हो कि कौसर क्या है?" हमने कहा : अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। आपने फरमाया : "यह एक नहर है, जिसे मेरे रब ने मुझे देने का वादा किया है। जिस पर अत्यधिक भलाई है। यह एक हौज़ (जलाशय) है जिस पर मेरी उम्मत क़ियामत के दिन आएगी।" (सहीह मुस्लिम : 607)
तथा सुनन तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 3284) में इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "कौसर जन्नत में एक नहर है जिसके दोनों किनारे सोने के हैं और इसका बहाव मोती और याकूत पर है।" तिर्मिज़ी ने इसे हसन सहीह कहा है और शैख़ अल्बानी ने इसे सहीह सुनन तिर्मिज़ी (3/135) में सहीह कहा है।
दूसरा अर्थ :
यह एक महान हौज़ है – और हौज़ का अर्थ है जलाशय यानी पानी को संग्रह करने की जगह - जिसे क़ियामत के दिन मैदाने-महशर में रखा जाएगा, जिस पर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत आएगी। इस हौज़ का पानी जन्नत में स्थित कौसर नहर से आएगा, इसी कारण इसे हौज़े-कौसर कहा जाता है। इसका प्रमाण सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 4255) में अबू ज़र्र रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित एक हदीस है, जिसमें कहा गया है कि : "हौज़ में जन्नत के दो परनाले गिर रहे होंगे।" इस हदीस का प्रत्यक्ष अर्थ यह है कि हौज़ जन्नत के निकट होगा ताकि जन्नत के अंदर स्थित कौसर नहर का पानी उसमें प्रवाहित हो, जैसा कि इब्ने हजर रहिमहुल्लाह ने फत्हुल बारी (11/466) में कहा है। और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।
जहाँ तक यह प्रश्न है कि क्या यह केवल नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए है, या दूसरे नबियों के लिए भी हैॽ
जहाँ तक कौसर नहर का संबंध है, जिसका पानी हौज़ में आएगा, तो किसी अन्य नबी के लिए ऐसी किसी नहर का उल्लेख नहीं मिलता। यह केवल हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ही दी जाएगी, जैसा कि सूरत अल-कौसर में अल्लाह ने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर यह उपकार किया है। इसलिए यह असंभव नहीं कि यह विशेष रूप से हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए ही है।
जहाँ तक हौज़े-कौसर की बात है, तो विद्वानों के बीच यह प्रसिद्ध है कि यह भी केवल हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए ही होगा। क़ुर्तुबी ने अपनी पुस्तक "अल-मुफ़हिम" में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। हालाँकि तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2367) ने समुरह रज़ियल्लाहु अन्हु से उल्लेख किया है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "हर नबी का एक हौज़ होगा और वे इस पर गर्व करेंगे कि किसके पास सबसे अधिक आने वाले होंगे। और मुझे आशा है कि मेरे पास सबसे अधिक आने वाले होंगे।"
इस हदीस की सभी सनदें कमज़ोर हैं, लेकिन कुछ विद्वानों ने इसकी अनेक रिवायतों के कारण इसे स्वीकार्य माना है, जैसा कि अल्बानी ने “सहीहा” (1589) में किया है, जबकि कुछ ने इसे कमज़ोर ही कहा है।
यदि इस हदीस को सही माना जाए, तो इसका अर्थ यह निकलता है नहरे कौसर तो हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ खास है, परन्तु हर नबी का अपना-अपना हौज़ होगा। लेकिन अगर इस हदीस को सही न माना जाए, तो यह असंभव नहीं कि हौज़े-कौसर भी विशेष रूप से हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए हो, अन्य नबियों के लिए न हो। और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।
सहीह हदीसों में जन्नत में स्थित नहरे-कौसर और मैदाने-महशर में मौजूद हौज़े-कौसर की कुछ विशेषताओं का वर्णन आया है। जन्नत में स्थित कौसर नहर की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :
इमाम बुखारी ने अपनी सहीह में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जब मैं जन्नत में चल रहा था, तो मैंने एक नहर देखी जिसके किनारे खोखले मोतियों के गुंबदों से बने थे।" मैंने पूछा : "ऐ जिब्रील! यह क्या है?" उन्होंने कहा : "यह वही कौसर है, जो आपके रब ने आपको प्रदान किया है।" फिर फ़रिश्ते ने अपने हाथ से उस पर मारा, तो उसकी मिट्टी या उसकी खुशबू तेज़ कस्तूरी जैसी थी।” (सहीह बुखारी : 6581)
मुसनद अहमद (हदीस संख्या : 12084) में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "मुझे कौसर दिया गया है, और यह एक नहर है जो धरती की सतह पर बहती है। इसके किनारे मोतियों के गुंबद हैं, इसकी छत नहीं है। मैंने इसकी मिट्टी को अपने हाथ से छुआ, तो इसकी मिट्टी सबसे सुगंधित कस्तूरी थी और इसके कंकर मोती थे।" [इस हदीस को शैख़ अल्बानी ने "अस-सहीहा" (हदीस संख्या : 2513) में सहीह कहा है।]
मुसनद अहमद (हदीस संख्या : 12828) की एक अन्य रिवायत में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से ही वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कौसर के बारे में पूछा गया, तो आपने फरमाया : "यह एक नहर है जो अल्लाह ने मुझे जन्नत में दी है। यह दूध से अधिक सफेद और शहद से अधिक मीठी है। इसमें ऐसे पक्षी हैं जिनकी गर्दनें ऊँटों की गर्दनों जैसी हैं।” उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने पूछा: "ये तो बड़े ऐश में रहने वाले पक्षी होंगे।" अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उत्तर दिया : “उन्हें खाने वाले उनसे भी अधिक ऐश में होंगे, ऐ उमर!" [इस हदीस को अल्बानी ने "सहीह अत-तरग़ीब वत्-तरहीब" (हदीस संख्या : 3740) में सहीह क़रार दिया है।
मैदाने-महशर के हौज़ की विशेषताएँ :
मैदाने-महशर में स्थित हौज़े-कौसर की विशेषताएँ कुछ इस प्रकार हैं :
बुखारी (हदीस संख्या : 6093) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 4244) ने अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णन किया है, कि उन्होंने कहा : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मेरा हौज़ इतना बड़ा है कि उसे पार करने के लिए एक महीने का समय दरकार होगा। उसके चारों कोने बराबर हैं, उसका पानी दूध से अधिक सफेद है, उसकी खुशबू कस्तूरी से बेहतर है और उसके प्याले आसमान के तारों के समान हैं। जो उसका पानी पी लेगा, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।"
सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 4261) में अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "इसमें सोने और चाँदी के बर्तन होंगे, जिनकी संख्या आकाश के तारों के बराबर होगी।" तथा एक रिवायत में है : “बल्कि आकाश के तारों से भी अधिक।”
तथा सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 4256) ही में सौबान रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इसके पानी के बारे में पूछा गया, तो आपने फरमाया : "यह दूध से अधिक सफेद और शहद से अधिक मीठा है। इसमें जन्नत से दो नालियाँ आकर पानी डालती हैं—एक सोने की और दूसरी चाँदी की।"
हौज़ से संबंधित हदीसें विद्वानों के निकट मुतवातिर हैं।
हौज़ से संबंधित हदीसों के मुतवातिर होने में हदीस के विद्वानों के बीच कोई संदेह नहीं है। इन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पचास से अधिक सहाबा ने वर्णन किया है। हाफिज़ इब्ने हजर ने अपनी पुस्तक “फत्हुल बारी” (11/468) में उन सहाबा के नामों का उल्लेख किया है जिन्होंने हौज़ से संबंधित हदीसों को बयान किया है। यहाँ तक कि इमाम क़ुर्तुबी "अल-मुफहिम शरह सहीह मुस्लिम" में कहा :
"हर मुकल्लफ (शरीय़त के आदेशों का पालन करने की बाध्यता के योग्य व्यक्ति) के लिए यह जानना और इस पर विश्वास करना अनिवार्य है कि अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को विशेष रूप से वह हौज़ प्रदान किया है, जिसका नाम, विशेषता और पेय सहीह और प्रसिद्ध हदीसों में स्पष्ट रूप से वर्णित है, जिनके एक साथ मिलने से निश्चित ज्ञान प्राप्त होता है।”..
मैदाने-महशर में हौज़ का स्थान :
जहाँ तक मैदाने-महशर में हौज़ के स्थान का संबंध है, तो इस बारे में विद्वानों में मतभेद है :
कुछ विद्वानों का कहना है कि यह पुल सिरात के बाद होगा।
जबकि अन्य विद्वानों का कहना है कि यह पुल सिरात से पहले होगा। यही अधिकांश विद्वानों का मत है और यही अधिक प्रबल मत है — हालाँकि अल्लाह ही सबसे अधिक जानता है। क्योंकि कुछ लोग जो हौज़ पर आएँगे, उन्हें जहन्नम की ओर ले जाया जाएगा। यदि यह पुल-सिरात के बाद होता, तो वे हौज़ तक पहुँच ही नहीं पाते, क्योंकि वे पहले ही जहन्नम में गिर चुके होते—हम उससे अल्लाह की पनाह माँगते हैं।
अंत में, हम एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गंभीर बात की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं, वह यह है कि :
हर वह व्यक्ति जो उम्मते-मुहम्मदिया से संबंध रखता है, यह आवश्यक नहीं कि उसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हौज़ से और आपके पावन हाथ से पीने का सौभाग्य और सम्मान प्राप्त हो। बल्कि हदीसों में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि इस उम्मत के कुछ पुरुषों को हौज़ से ज़ोर देकर दूर हटा दिया जाएगा। हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें इससे सुरक्षित रखे।
तो वे कौन लोग होंगे जो पिएँगे, और कौन वे होंगे जिन्हें दूर हटा दिया जाएगा?
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसका स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर दिया है, ताकि बहाने बनाने वाले के पास कोई बहाना न रहे, और न ही किसी टालमटोल करने वाले के पास कोई तर्क हो।
मुस्लिम ने अपनी सहीह (हदीस संख्या: 367) में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक बार क़ब्रिस्तान गए और फ़रमाया : "तुम पर सलामती हो, ऐ ईमान लाने वालों के घरवालो! और हम भी, यदि अल्लाह ने चाहा, तुमसे मिलने वाले हैं। काश! हमने अपने भाइयों को देख लिया होता।" सहाबा ने कहा : क्या हम आपके भाई नहीं हैं, ऐ अल्लाह के रसूल? आपने फ़रमाया : "तुम मेरे सहाबी (साथी) हो। और हमारे भाई वे हैं जो अभी आए नहीं।” सहाबा ने पूछा : "ऐ अल्लाह के रसूल! आप अपनी उम्मत के उन लोगों को कैसे पहचानेंगे, जो अभी आए नहीं?" आपने फ़रमाया : “यदि किसी व्यक्ति के पास काले घोड़ों के बीच सफेद माथे और सफेद टाँगों वाले घोड़े हों, तो क्या वह अपने घोड़ों को नहीं पहचानेगा?” सहाबा ने कहा : क्यों नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल। फिर आपने फ़रमाया : “वे क़ियामत के दिन वुज़ू की वजह से चमकते हुए आएँगे, और मैं हौज़ पर उनका आगे-आगे इंतज़ार करूँगा। लेकिन कुछ लोगों को मेरे हौज़ से ऐसे हटा दिया जाएगा जैसे भटके हुए ऊँट को पानी से हटा दिया जाता है। मैं उन्हें पुकारूँगा: आओ! तो कहा जाएगा: उन्होंने आपके बाद बदलाव कर लिया। तब मैं कहूँगा: दूर हो जाओ, दूर हो जाओ।” (मैं कहूँगा) "उन्हें आने दो, लेकिन मुझसे कहा जाएगा: "इन्होंने आपके बाद (आपके तरीकों को) बदल दिया था।" तब मैं कहूँगा: "दूर हो जाओ! दूर हो जाओ!”
सहीह बुखारी (हदीस संख्या : 6528) और सहीह मुस्लिम (हदीस संख्या : 4243) में अबू हाज़िम से वर्णित है कि सहल रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह कहते हुए सुना : "मैं हौज़ पर तुमसे पहले पहुँचने वाला हूँ। जो भी वहाँ पहुँचेगा, वह पीएगा, और जो पी लेगा, वह कभी प्यासा नहीं होगा। और कुछ लोग मेरे पास आएँगे, जिन्हें मैं पहचानूँगा और वे मुझे पहचानेंगे, फिर मेरे और उनके बीच रोक लगा दी जाएगी।”
अबू हाज़िम कहते हैं: नो'मान बिन अबी अय्याश ने मुझे यह हदीस बयान करते हुए सुना, तो पूछा : क्या सहल (रज़ियल्लाहु अन्हु) से तुमने इसे इसी तरह कहते हुए सुना है? तो मैंने कहा : हाँ। तब उन्होंने कहा : "मैं गवाही देता हूँ कि मैंने अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) को यह वृद्धि करते हुए सुना : फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फरमाएंगे : "वे मेरे ही लोग हैं।" तो कहा जाएगा : आप नहीं जानते कि उन्होंने आपके बाद क्या किया।" तब मैं कहूँगा : "दूर हो जाओ, दूर हो जाओ, वे लोग जिन्होंने मेरे बाद बदलाव किया!”
तथा बुखारी (2194) और मुस्लिम (4257) ने अपनी सहीह में अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है! मैं कुछ लोगों को अपने हौज़ से उसी तरह दूर भगा दूँगा जैसे अनजान ऊँटों को हौज़ से दूर भगाया जाता है।"
कु़र्तुबी (रहिमहुल्लाह) कहते हैं : "हमारे विद्वानों (रहिमहुमुल्लाह) ने कहा है : हर वह व्यक्ति जिसने अल्लाह के धर्म से फिरकर मुँह मोड़ा, या उसमें ऐसा नवाचार किया जिसे अल्लाह पसंद नहीं करता और जिसकी अनुमति नहीं दी — वह हौज़ से दूर किए जाने वालों में होगा। और उनमें सबसे अधिक दूर किए जाने वाले वे हैं जिन्होंने मुसलमानों की जमाअत का विरोध किया और उनके रास्ते से अलग हुए, जैसे विभिन्न फिरकों वाले ख़ारिजी, विभिन्न गुमराहियों वाले राफ़िज़ी, विभिन्न विचारों वाले मो’तज़िला, और जो उनके मार्ग पर चले। इसी प्रकार ज़ालिम शासक, अत्याचार में अति करने वाले, सत्य को मिटाने वाले, उसके मानने वालों की हत्या और अपमान करने वाले, खुलेआम बड़े गुनाह करने वाले, और गुनाहों को हल्का समझने वाले, तथा गुमराही और बिदअत वाले लोग..”
(देखिए: इमाम कुर्तुबी की पुस्तक अत्-तज़किरा, पृष्ठ: 306)
इसलिए बंदे को चाहिए कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत का अनुसरण करने में पूरा प्रयास करे और उनके मार्ग का किसी भी बात में विरोध न करे, इस आशा के साथ कि अल्लाह उसे इस मुबारक हौज़ से पीने का सौभाग्य प्रदान कर दे। अन्यथा इससे बड़ा अपमान और पछतावा क्या होगा कि किसी को नबी सस के सामने से धकेल दिया जाए, जबकि प्यास असहनीय स्तर तक पहुँच चुकी हो, और उसे उस ठंडे, स्वादिष्ट पानी से वंचित कर दिया जाए, फिर उस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की — दूरी और विनाश — की बद्दुआ भी पड़ जाए। अल्लाह की पनाह! मात्र इसकी कल्पना ही एक बड़ा अज़ाब है, तो फिर इसका देखना और सामना करना कैसा होगा?
हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह हमें और हमारे मुसलमान भाइयों को सुन्नत का पालन करने और बिदअत व अवज्ञा से बचने की तौफ़ीक़ प्रदान करे.... आमीन। और हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है।
इस विषय के बारे में और अधिक जानकारी के लिए देखें : अल-क़ियामतुल-कुबरा (पृष्ठ: 257-262) अल-जन्ना वन्नार (पृष्ठ: 166-167) – शैख उमर अल-अशक़ऱ, तथा हाफ़िज़ इब्ने हजर की पुस्तक “फत्हुल-बारी” (11/466)