हम जिन्नों की हानि से स्वयं को कैसे सुरक्षित रखें?

प्रश्न: 10513

मैं जिन्नों के साथ समस्याओं का सामना कर रही हूँ। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में जिन्नों को अलग-अलग हालात में प्रकट होते देखा है। पहले कभी उनसे मुझे परेशानी नहीं हुई, लेकिन हाल के समय में स्थिति बदल गई है। जब हम अपने नए फ्लैट में आए, तो शुरुआत में ही मैंने एक जिन्न को देखा। यह मामला बार-बार होने लगा। मैं  इस जिन्न या जिन्नों की और से कुछ बातें नोटिस करती थी, जैसे दरवाज़ों का अपने-आप खुल जाना। तथा मैं उन्हें देखती थी और उनकी आवाज़ें सुनती थी... आदि। लेकिन अब हालात बहुत ज़्यादा बदल गए हैं। कुछ घटनाएँ रोज़ होने लगी हैं और वे मुझे अपने ही घर में असहज महसूस कराती हैं, यहाँ तक कि मैं अब इस घर में रहना नहीं चाहती। जिन्न (या जिन्नात) दरवाज़े खोल देता है, मेरा नाम लेकर चिल्लाता है जिससे मैं डर कर नींद से जाग जाती हूँ, चीज़ों पर दस्तक देता है, बिल्ली के रूप में दिखाई देता है, मेरे कंप्यूटर और फोन के साथ छेड़छाड़ करता है, मैं उसकी परछाईं देखती हूँ… और भी बहुत कुछ। यह सब बहुत अजीब है। वास्तव में मुझे नहीं पता कि इन समस्याओं का सामना कैसे करूँ। मुझे उम्मीद है कि इस घर से निकल जाने पर समस्या समाप्त हो जाएगी। लेकिन फिलहाल मैंने सूरत अल-बक़रह, अल-इख़्लास, अल-फ़लक़ और अन-नास पढ़ने की कोशिश की है। मैं घर में क़ुरआन की रिकॉर्डिंग भी चलाती हूँ। जब मैं ये सब करती हूँ तो ये घटनाएँ रुक जाती हैं, लेकिन जैसे ही मैं पढ़ना बंद करती हूँ, तो जिन्न फिर से आ जाते हैं और किसी तरह मुझे अपनी मौजूदगी का पता देते हैंजिन्न फिर से किसी न किसी तरह अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाता है (अधिकतर मामलों में)।जब मैं ये सब करती हूँ तो ये घटनाएँ रुक जाती हैं, लेकिन जैसे ही मैं पढ़ना बंद करती हूँ, तो जिन्न फिर से आ जाता है और (अधिकतर मामलों में) किसी न किसी तरह अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाता है।

कभी-कभी कैसेट प्लेयर अपने-आप बंद हो जाता है और क़ुरआन पढ़ते समय कंप्यूटर रीस्टार्ट हो जाता है। ऐसा कई बार हो चुका है। जिन्न मुझे अक्सर सपनों में भी दिखाई देते हैं।

मुझे नहीं पता कि इस स्थिति से कैसे कैसे छुटकारा पाया जाए, लेकिन मैं इस संबंध में आपके उत्तर या सलाह की बहुत सराहना करुँगी, और आशा करती हूँ कि यह जल्दी होगा।

उत्तर का सारांश

जिन्नों की हानि से बचाव के कुछ तरीक़े ये हैं : जिन्नों से अल्लाह की शरण माँगना, मुअव्विज़तैन (सूरतुल-फ़लक़ और सूरतुन-नास) पढ़ना, आयतुल-कुर्सी पढ़ना, सूरतुल-बक़रह पढ़ना, सूरतुल-बक़रह की अंतिम आयतें पढ़ना, “ला इलाहा इल्लल्लाह वह्दहू ला शरीक लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, वहुवा अ़ला कुल्लि शैईन क़दीर” पढ़ना, अल्लाह का अधिक से अधिक ज़िक्र करना, अज़ान देना, सामान्यतः क़ुरआन की तिलावत करना। ये सब शैतानों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

उत्तर का पाठ

पहला :

क्या इंसान जिन्न को देख सकता है?

प्रश्नकर्ता का यह कहना कि उसने जिन्न को देखा — यह कथन गलत है; क्योंकि जिन्न तो देखते हैं लेकिन इनसान लोग उन्हें नहीं देख सकते।

इमाम शाफ़ेई रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"यदि कोई विश्वसनीय व्यक्ति यह दावा करे कि वह जिन्नों को देखता है, तो उसकी गवाही को रद्द कर दिया जाएगा। क्योंकि अल्लाह तआला फरमाता है :  إنه يراكم هو وقبيله من حيث لا ترونهم "निःसंदेह वह तथा उसकी ज़ाति, तुम्हें वहाँ से देखते हैं, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते।" (अल-आराफ़ : 27), सिवाय इसके कि वह व्यक्ति नबी हो।” (अहकामुल-क़ुरआन 2/195-196).

इब्न हज़्म रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"जिन्न एक वास्तविक अस्तित्व हैं, और वे अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ला की मख़लूक़ में से एक मख़लूक़ हैं। उनमें भी काफ़िर और मोमिन होते हैं। वे हमें देखते हैं और हम उन्हें नहीं देखते। वे खाते हैं, संतान उत्पन्न करते हैं और उनकी मृत्यु होती है। अल्लाह तआला ने फरमाया :  يا معشر الجن والإنس "ऐ जिन्न तथा मनुष्य के समूह!" (अर्-रहमान : 33) तथा फरमाया :  والجان خلقناه من قبل من نار السموم "और इससे पहले जिन्नों को हमने धुँआ रहित अति गर्म आग से पैदा किया।" (अल-हिज्र : 27) तथा अल्लाह तआला ने उनके बारे में खबर देते हुए फरमाया कि उन्होंने कहा :  وأنا منا المسلمون ومنا القاسطون فمن أسلم فأولئك تحروا رشدا وأما القاسطون فكانوا لجهنم حطبا "और यह कि हममें से कुछ आज्ञाकारी हैं और हममें से कुछ अत्याचारी हैं। फिर जो आज्ञाकारी हो गया, तो वही लोग हैं जिन्होंने सीधा रास्ता खोजा। तथा जो अत्याचारी हैं, तो वे जहन्नम का ईंधन होंगे।" (अल-जिन्न : 14-15) तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :  إنه يراكم هو وقبيله من حيث لا ترونهم "निःसंदेह वह तथा उसकी ज़ाति, तुम्हें वहाँ से देखते हैं, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देखते।" (अल-आराफ़ : 27) तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :  أفتتخذونه وذريته أولياء من دوني   "क्या फिर (भी) तुम उसे (शैतान) और उसकी संतान को मुझे छोड़कर मित्र बनाते हो?" (अल-कहफ : 50)

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :  كل من عليها فان   "हर कोई जो इस (धरती) पर है, नष्ट होने वाला है।" (अर्-रहमान :26) तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :  كل نفس ذائقة الموت   "हर जीव को मौत का स्वाद चखना है।" (अल-अंबिया : 35)...”

(देखिए : अल-मुहल्ला 1/34-35)

इसलिए संभव है कि प्रश्नकर्ता ने जो देखा हो वह कल्पनाएँ और भ्रम हों, या फिर कोई जिन्न अपने असली रूप से अलग रूप में प्रकट हुआ हो।

दूसरा :

क्या जिन्न इनसान को नुकसान पहुँचा सकता है?

जहाँ तक जिन्न द्वारा इंसान को नुकसान पहुँचाने की बात है, तो यह सिद्ध है और होता भी है। जबकि कुरआन और शरीयत में बताई गई दुआओं के द्वारा उससे बचाव किया जा सकता है।

शैख़ इब्न उसैमीन रहिमहुल्लाह कहते हैं :

इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन्न इंसानों को नुकसान पहुँचा सकते हैं, यहाँ तक कि कभी-कभी यह हत्या तक पहुँच जाता है। वे पत्थर फेंक सकते हैं, इनसान को डरा सकते हैं और अन्य कई तरह की तकलीफ़ें दे सकते हैं। ये सब चीज़ें सुन्नत में साबित हैं और वास्तविक घटनाएँ उन्हें प्रमाणित करती हैं। यह बात सिद्ध है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक युद्ध (संभवतः ख़ंदक़) के दौरान एक सहाबी को अपने घर जाने की अनुमति दी। वह सहाबी नवविवाहित थे। जब वह अपने घर पहुँचे, तो उन्होंने अपनी पत्नी को दरवाज़े पर खड़ा पाया। उन्होंने इस पर नाराज़गी जताई। उनकी पत्नी ने उनसे कहा : "अंदर जाइए।" वह अंदर गए, तो बिस्तर पर एक साँप को कुंडली मारे देखा। उनके पास एक भाला था, जिससे उन्होंने साँप को मारा और वह मर गया। लेकिन उसी समय – यानी ठीक उसी समय जब साँप मरा – वह सहाबी भी मर गए। यह पता नहीं है कि उनमें से पहले कौन मरा, साँप या आदमी। जब यह खबर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मिली, तो आपने घरों में पाए जाने वाले साँपों को मारने से मना कर दिया, सिवाय उन साँपों के जिनकी पूँछ कटी हो या छोटी हो, और उन साँपों के जिनकी पीठ पर दो सफेद लकीरें हों।

यह इस बात का प्रमाण है कि जिन्न इंसानों पर हमला कर सकते हैं और उन्हें नुकसान पहुँचा सकते हैं, जैसा कि वास्तविक जीवन की अनेक घटनाएँ इसकी गवाही देती हैं। ये बातें इतनी आम हो चुकी हैं और अक्सर सुनने को मिलता है कि कभी-कभी किसी वीरान जगह पर जाता है, तो पत्थर फेंके जाते हैं, जबकि उसे उस वीराने में कोई इनसान दिखाई नहीं देता। कभी वह आवाज़ें सुनता है, कभी उसे पेड़ों जैसी सरसराहट और ऐसी ही कोई आवाज़ सुनाई देती है, जिससे उसे घबराहट और परेशानी महसूस होती है।

इसी प्रकार, कभी-कभी जिन्न इंसान के शरीर में प्रवेश कर जाता है— या तो प्यार में पड़कर, या नुकसान पहुंचाने के इरादे से, या किसी और वजह से। अल्लाह का यह फ़रमान इस ओर इशारा करता है : الذين يأكلون الربا لا يقومون إلا كما يقوم الذي يتخبطه الشيطان من المس "जो लोग ब्याज खाते हैं, वे (क़ियामत के दिन अपनी क़ब्रों से) ऐसे उठेंगे, जैसे वह व्यक्ति उठता है, जिसे शैतान ने छूकर पागल बना दिया हो।" (अल-बक़रह : 275)।

इस स्थिति में कभी-कभी जिन्न स्वयं इंसान के भीतर से बोलने लगता है और उस व्यक्ति से संवाद करता है जो उस पर क़ुरआन की आयतें पढ़ रहा होता है। कभी-कभी पढ़ने वाला उससे यह वचन भी ले लेता है कि वह दोबारा वापस नहीं आएगा, और इसी तरह की कई अन्य बातें भी होती हैं, जिनका उल्लेख खबरों में विस्तार से मिलता है और जो लोगों के बीच फैल चुकी हैं।

जिन्नों से स्वयं की सुरक्षा करना

इस आधार पर जिन्नों की बुराई से बचाव का उपाय यह है कि इंसान उन दुआओं और आयतों को पढ़े जो सुन्नत में वर्णित हैं और जिनके द्वारा उनसे सुरक्षा प्राप्त की जाती है। जैसे आयतुल कुर्सी—क्योंकि जब कोई व्यक्ति रात में आयतुल कुर्सी पढ़ लेता है तो अल्लाह की ओर से उस पर एक रक्षक (फरिश्ता) नियुक्त हो जाता है, और सुबह होने तक कोई शैतान उसके पास नहीं आ सकता। और अल्लाह ही सबसे बड़ा रक्षक है। “मजमूओ फतावा शैख इब्न उसैमीन” (1/287, 288).

तथा सुन्नत में कई ऐसे अज़कार (दुआएं) वर्णित हैं, जिनके द्वारा इंसान शैतानों से सुरक्षा प्राप्त कर सकता है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं :

  • जिननों से अल्लाह की शरण लेना

अल्लाह तआला ने फरमाया :  وإما ينزغنك من الشيطان نزغ فاستعذ بالله إنه هو السميع العليم "और यदि शैतान आपको उकसाए, तो अल्लाह से शरण माँगिए। निःसंदेह वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।" [फ़ुस्सिलात : 36] एक दूसरी जगह फरमाया :  وإما ينزغنك من الشيطان نزغ فاستعذ بالله إنه سميع عليم "और यदि शैतान आपको उकसाए, तो अल्लाह से शरण माँगिए। निःसंदेह वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।" [अल-आराफ़ : 200]

सुलैमान बिन सुरद- रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि : दो आदमी अल्लाह के नबी - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आपस में गाली-गलौज करने लगे, यहाँ तक कि उनमें से एक का चेहरा लाल हो गया। यह देखकर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “मैं एक ऐसा कलिमा जानता हूँ, अगर वह इसे कह ले तो उसका ग़ुस्सा दूर हो जाएगा : “أعُوذ بالله من الشَّيطان الرجيم” (अऊज़ु बिल्लाहि मिनश्शैतानिर्रजीम) “मैं धिक्कारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगता हूँ।” इसे इमाम बुख़ारी (हदीस संख्या : 3108) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2610) ने रिवायत किया है।

  • मुअव्विज़तैन (सूरतुल-फ़लक़ और सूरतुन-नास) का पाठ

अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जिन्नों और इंसानों की नज़र (बुरी नज़र) से अल्लाह की शरण माँगा करते थे, यहाँ तक कि जब मुअव्विज़तैन (सूरतुल-फ़लक़ और सूरतुन-नास) नाज़िल हुईं, तो आपने इन्हीं दोनों को अपनाया और इनके अलावा दूसरी दुआओं को छोड़ दिया।” इसे इमाम तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2058) ने रिवायत किया है और 'हसन ग़रीब' कहा है। साथ ही नसाई (हदीस संख्या : 5494) और इब्न माजह (हदीस संख्या : 3511) ने भी इसे रिवायत किया है। तथा शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह ने इसे “सहीह अल-जामे ” (हदीस संख्या : 4902) में सहीह कहा है।

  • आयतुल कुर्सी का पाठ

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, वह कहते हैं : "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे रमज़ान की ज़कात की रखवाली पर नियुक्त किया। एक रात एक आने वाला आया और खाने से मुट्ठी भर-भरकर लेने लगा। मैंने उसे पकड़ लिया और कहा: मैं तुम्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास ले जाऊँगा। उसने कहा : मैं तुम्हें कुछ ऐसे शब्द सिखाऊँगा, जिनसे अल्लाह तुम्हें फ़ायदा देगा। मैंने पूछा : वे क्या हैं? उसने कहा : जब तुम अपने बिस्तर पर सोने के लिए जाओ, तो यह आयत पढ़ लिया करो :  الله لا إله إلا هو الحي القيوم... ‘‘अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल हय्युल क़य्यूम…’’ आयत के अंत तक। [अल-बक़रह : 255]. क्योंकि जब तुम इसे पढ़ोगे, तो अल्लाह तआला की ओर से तुम्हारे लिए एक रक्षक नियुक्त रहेगा और सुबह होने तक कोई शैतान तुम्हारे पास नहीं आएगा।” (सुबह) नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पूछा : "आज रात तुम्हारे कैदी ने क्या किया?" मैंनें कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! उसने मुझे एक ऐसी बात सिखाई, जिसके बारे में उसका दावा है कि अल्लाह तआला मुझे उससे लाभ पहुँचाएगा। आपने पूछा : "वह क्या है?" मैंने कहा : उसने मुझे यह हुक्म दिया कि जब मैं अपने बिस्तर पर जाऊँ तो आयतुल कुर्सी पढ़ूँ। उसका कहना है कि अगर मैं ऐसा करूँगा तो सुबह होने तक कोई भी मुझे नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा, और अल्लाह तआला की ओर से निरंतर मुझ पर एक रक्षक बना रहेगा। तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "उसने तुमसे सच कहा है, हालांकि वह बहुत झूठा है। वह शैतान था।" इसे इमाम बुख़ारी (हदीस संख्या : 3101) ने रिवायत किया है।

  • सूरतुल-बक़रह पढ़ना

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अपने घरों को कब्रिस्तान न बनाओ, क्योंकि जिस घर में सूरतुल-बक़रह पढ़ी जाती है, उससे शैतान भाग जाता है।” इसे इमाम मुस्लिम (हदीस संख्या : 780) ने रिवायत किया है।

  • सूरतुल-बक़रह की अंतिम आयतें पढ़ना

अबू मसऊद अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो व्यक्ति रात में सूरतुल-बक़रह की आख़िरी दो आयतें पढ़ ले, वे उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।” इसे इमाम बुख़ारी (हदीस संख्या : 4723) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 807) ने रिवायत किया है।

नो’मान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आपने फरमाया : “अल्लाह तआला ने आसमानों और ज़मीन की पैदाइश से दो हज़ार साल पहले एक किताब लिखी, फिर उसमें से दो आयतें उतारीं जिनसे सूरतुल-बक़रा का अंत किया गया। वे दो आयतें जिस घर में तीन रातों तक पढ़ी जाएँ, वहाँ कोई शैतान ठहर नहीं सकता।” इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2882) ने रिवायत किया है। शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह ने "सहीहुल जामे’" (हदीस संख्या : 1799) में इसे सहीह क़रार दिया है।

  • सौ (100) बार ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीक लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु वहुवा अ़ला कुल्लि शैयिन क़दीर पढ़ना

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु  से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जो व्यक्ति एक दिन में सौ बार यह पढ़े : “ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीक लहु, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, वहुवा अ़ला कुल्लि शैइन क़दीर।” (अल्लाह के सिवा कोई सच्चा मा’बूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए बादशाहत और उसी के लिए सारी प्रशंसा है, और वह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।) उसे दस गुलाम आज़ाद करने के बराबर पुण्य मिलेगा, उसके लिए सौ नेकियाँ लिखी जाएँगी और उसकी सौ बुराइयाँ मिटा दी जाएँगी। यह उसके लिए उस दिन शैतान से हिफ़ाज़त का ज़रिया बनेगा, जब तक कि शाम न हो जाए। और कोई व्यक्ति उससे बेहतर अमल लेकर नहीं आएगा, सिवाय उसके जिसने इससे ज़्यादा कार्य किया हो।” इसे इमाम बुख़ारी (हदीस संख्या : 31119) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 2691) ने रिवायत किया है।

  • अल्लाह तआला का अधिक से अधिक ज़िक्र करना

हारिस अश्अ़री रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :

"अल्लाह ने यह्या बिन ज़करिया (अलैहिस्सलाम) को पाँच बातों का आदेश दिया कि वे स्वयं उन पर अमल करें और बनी इस्राईल को भी उन पर अमल करने का हुक्म दें… और मैं तुम्हें अल्लाह तआला का ज़िक्र करने का आदेश देता हूँ। क्योंकि इसकी मिसाल उस आदमी की तरह है जिसका दुश्मन तेज़ी से पीछा कर रहा हो, यहाँ तक कि वह एक मज़बूत क़िले में पहुँचकर अपने आपको उनसे सुरक्षित कर ले। इसी तरह बंदा शैतान से अपनी रक्षा केवल अल्लाह के ज़िक्र से ही कर सकता है...” इसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 2863) ने रिवायत किया है और "हसन सहीह" कहा है तथा शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह ने "सहीहुल जामे’" (1724) में इसे सहीह क़रार दिया है।

  • अज़ान देना

सुहैल बिन अबी सालेह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्होंने कहा : "मेरे पिता ने मुझे बनी हारिसा के पास भेजा, और मेरे साथ हमारा एक ग़ुलाम या साथी भी था। किसी ने एक बाग़ (दीवार के भीतर) से मेरे साथी को उसके नाम से पुकारा। मेरे साथ वाला दीवार पर चढ़कर देखने लगा, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दिया। जब मैंने यह बात अपने पिता को बताई, तो उन्होंने कहा : अगर मुझे पहले पता होता कि तुम्हें ऐसा सामना करना पड़ेगा, तो मैं तुम्हें न भेजता। लेकिन अगर तुम कोई आवाज़ सुनो, तो नमाज़ की अज़ान दो। क्योंकि मैंने अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु को सुना वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से बयान कर रहे थे कि आपने फरमाया : “जब नमाज़ के लिए अज़ान दी जाती है, तो शैतान पीठ फेरकर हवा छोड़ता हुआ भाग जाता है।" इसे इमाम मुस्लिम (हदीस संख्या : 389) ने रिवायत किया है।

  • क़ुरआन की तिलावत शैतानों से सुरक्षा प्रदान करती है

अल्लाह तआला फरमाता है : وإذا قرأت القرآن جعلنا بينك وبين الذين لا يؤمنون بالآخرة حجاباً مستوراً   "और जब आप क़ुरआन पढ़ते हैं, तो हम आपके बीच और उनके बीच, जो आख़िरत (परलोक) पर ईमान नहीं रखते, एक छिपाने वाले पर्दे की आड़ बना देते हैं।" [अल-इसरा : 45]

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।

संदर्भ

स्रोत

शैख मुहम्मद सालेह अल-मुनज्जिद