मुस्तहाज़ा (इस्तिहाज़ा वाली महिला) की तीन अवस्थाएँ होती हैं :
पहली अवस्था :
महिला को इस्तिहाज़ा शुरू होने से पहले अपने मासिक धर्म (हैज़) की निश्चित अवधि मालूम हो, तो वह अपने पहले से ज्ञात माहवारी के दिनों की ओर लौटेगी और उसी अवधि को अपना हैज़ मानेगी। उस अवधि में हैज़ के सभी नियम लागू होंगे। उस अवधि के बाद आने वाला रक्त इस्तिहाज़ा माना जाएगा, जिस पर मुस्तहाज़ा के नियम लागू होंगे।
उदाहरण : एक महिला को पहले हर महीने की शुरुआत में छह दिन माहवारी आती थी। फिर बाद में उसे इस्तिहाज़ा हो गया और रक्त लगातार आने लगा, तो उसका हैज़ हर महीने की शुरुआत के वही छह दिन होंगे, और इसके अलावा जो भी खून आए वह इस्तहाज़ा है।
इसका प्रमाण उम्मुल-मोमिनीन आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत है कि फ़ातिमा बिन्त अबी हुबैश रज़ियल्लाहु अन्हा ने कहा : "ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे इस्तिहाज़ा रहता है और मैं पाक नहीं होती। तो क्या मैं नमाज़ छोड़ दूँ?
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "नहीं। यह तो एक नस का रक्त है। लेकिन जितने दिनों तक पहले तुम्हें हैज़ आता था, उतने दिनों तक नमाज़ छोड़ दो। फिर ग़ुस्ल करो और नमाज़ पढ़ो।" इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है, और सहीह मुस्लिम में है :
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहु अन्हा से फ़रमाया: "जितने दिनों तक तुम्हारा हैज़ तुम्हें रोकता था, उतने दिन ठहरी रहो, फिर ग़ुस्ल करो और नमाज़ पढ़ो।"
इस आधार पर, जिस मुस्तहाज़ा महिला की पहले से निश्चित हैज़ की अवधि है, वह अपने हैज़ की अवधि के बराबर बैठी रहेगी, फिर ग़ुस्ल करके नमाज़ पढ़ेगी और उसके बाद आने वाले रक्त की परवाह नहीं करेगी।
दूसरी अवस्था :
इस्तिहाज़ा शुरू होने से पहले महिला का कोई निश्चित मासिक धर्म न हो, बल्कि पहली बार रक्त आने के समय से ही लगातार रक्त आता रहा हो, तो ऐसी महिला रक्त की पहचान (तमईज़) के आधार पर निर्णय करेगी। जिस रक्त में हैज़ की पहचान हो, वही हैज़ माना जाएगा। यदि रक्त काला हो, या गाढ़ा हो, या उसमें हैज़ जैसी विशेष गंध हो, तो वह हैज़ माना जाएगा और उस पर हैज़ के अहकाम लागू होंगे। इसके अलावा जो खून हो, वह इस्तिहाज़ा माना जाएगा और उसपर इस्तिहाज़ा के अहकाम लागू होंगे।
इसका उदाहरण यह है कि :
- एक महिला ने पहली बार खून देखा और वह लगातार आता रहा, परंतु महीने में दस दिन खून काला रहता है और बाकी महीने लाल रहता है।
- या दस दिन खून गाढ़ा रहता है और बाकी महीने पतला।
- या दस दिन खून में माहवारी जैसी बदबू रहती है और बाकी महीने बिना बदबू के होता है।
तो पहले उदाहरण में काला खून, दूसरे में गाढ़ा खून, और तीसरे में बदबूदार खून उसका हैज़ होगा। बाकी सब इस्तिहाज़ा होगा। इसका प्रमाण यह हदीस है, जिसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़ातिमा बिन्त अबी हुबैश (रज़ियल्लाहु अन्हा) से फ़रमाया : "जब हैज़ का रक्त होता है, तो वह काला होता है जिसे पहचाना जाता है। जब ऐसा रक्त हो तो नमाज़ छोड़ दो। और जब दूसरा (सामान्य) रक्त हो तो वुज़ू करके नमाज़ पढ़ो, क्योंकि वह तो केवल नस का रक्त है।"
इसे अबू दाऊद और नसाई ने रिवायत किया है, तथा इब्न हिब्बान और हाकिम ने इसे सहीह कहा है।
यद्यपि इस हदीस की सनद और मतन (कुछ शब्दों) पर विद्वानों ने चर्चा की है, फिर भी विद्वानों ने इस पर अमल किया है, और यह इस बात से बेहतर है कि केवल आम महिलाओं की आदतों की ओर लौटाया जाए।
तीसरी अवस्था :
महिला की पहले से अपने हैज़ की कोई निश्चित अवधि ज्ञात न हो, और रक्त में ऐसी कोई स्पष्ट पहचान भी न हो जिससे हैज़ और इस्तिहाज़ा को अलग किया जा सके। अर्थात् : पहली बार खून देखने के समय से ही इस्तिहाज़ा जारी हो, और उसका खून एक ही गुण पर हो या इतनी उलझी हुई गुणवत्ता पर हो कि उसे हैज़ का गुण नहीं कहा जा सके, तो ऐसी स्त्री आम महिलाओं की आदत के अनुसार अमल करेगी। इस तरह, उसका हैज़ हर महीने छह या सात दिन माना जाएगा। और यह अवधि उस समय से शुरू होगी जब उसने पहली बार रक्त देखा। इसके अलावा जो खून होगा वह इस्तिहाज़ा है।
उदाहरण : एक महिला ने पहली बार महीने की 5 तारीख़ को खून देखा, और उसके बाद लगातार खून आता रहता है, लेकिन उसमें ऐसा कोई गुण नहीं है जिससे हैज़ का सही फ़र्क किया जा सके—न रंग से, न किसी और चीज़ से। तो उसके लिए हर महीने 5 तारीख़ से शुरू होकर छह या सात दिन हैज़ होंगे। उसके बाद के दिन इस्तिहाज़ा होंगे। इसका प्रमाण हम्ना बिन्त जह्श (रज़ियल्लाहु अन्हा) की हदीस है। उन्होंने कहा : "ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे बहुत ज़्यादा और तीव्र इस्तिहाज़ा रहता है, आप इसमें क्या राय देते हैं? यह तो मुझे नमाज़ और रोज़े से रोक देता है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "मैं तुम्हें ‘कुरस्फ़’ (रुई) इस्तेमाल करने का तरीका बताता हूँ, जिसे तुम शर्मगाह पर रखो। इससे खून रुक जाएगा।" उन्होंने कहा : "रक्त उससे भी अधिक है।"
तब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "यह तो शैतान की ठोकरों में से एक ठोकर है। इसलिए अल्लाह के ज्ञान के अनुसार हर महीने 6 या 7 दिन हैज़ मानो। फिर ग़ुस्ल करो। जब तुम समझो कि तुम पूरी तरह पवित्र और साफ हो गई हो, तो चौबीस या तेईस रातें और उनके दिन नमाज़ पढ़ो और रोज़ा रखो।” इस हदीस को अहमद, अबू दाऊद और तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है, और तिर्मिज़ी ने इसे सहीह कहा है, तथा अहमद से इसको सहीह कहने और बुख़ारी से इसको हसन कहने का उल्लेख किया गया है।
6 या 7 दिन कैसे तय किए जाएँ?
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का "6 या 7 दिन" कहना मनमाना चुनाव के लिए नहीं है, बल्कि इज्तिहाद (विचार करने) के लिए है। महिला विचार करेगी कि उसकी उम्र, शारीरिक बनावट और गर्भ में उसकी जैसी परिवार की अन्य महिलाओं की आदत, इसी तरह उसके रक्त की स्थिति और उसके गुणों को देखते हुए कौन-सी अवधि उसकी स्थिति के अधिक क़रीब और उपयुक्त है। यदि 6 दिन अधिक क़रीब और उपयुक्त लगें, तो उसे 6 दिन मान ले और यदि 7 दिन अधिक क़रीब और उपयुक्त लगें, तो 7 दिन मान ले।”
शैख इब्न उसैमीन रहिमहुल्लाह की पुस्तक "रिसालतुन फ़ी अद-दिमा' अत-तबीइय्या लिन्निसा" (महिलाओं के प्राकृतिक रक्त संबंधी नियम) से उद्धरण समाप्त हुआ।
निष्कर्ष : यह कि जिस समय महिला उस खून को हैज़ का खून मानेगी, उस समय वह हाइज़ा (मासिक धर्म वाली) होगी। तथा जिस समय को वह “हैज़ का अंत” मानेगी, उस समय वह पवित्र मानी जाएगी। उसके बाद वह नमाज़ पढ़ेगी, रोज़े रखेगी और उसका पति उससे वैवाहिक संबंध स्थापित कर सकता है।