उम्रा चार चीज़ों से मिलकर बनता है :
एहराम बाँधना, अल्लाह के पवित्र घर (काबा) का तवाफ़ करना, सफ़ा और मरवा के बीच सई करना, और बाल मुँडवाना या छोटे करवाना।
विस्तृत उत्तर में हम सुन्नत में वर्णित उम्रा के तरीके को संक्षेप में बताएँगे।
मैं उम्रा का तरीक़ा विस्तार से जानना चाहता हूँ।
उम्रा चार चीज़ों से मिलकर बनता है :
एहराम बाँधना, अल्लाह के पवित्र घर (काबा) का तवाफ़ करना, सफ़ा और मरवा के बीच सई करना, और बाल मुँडवाना या छोटे करवाना।
विस्तृत उत्तर में हम सुन्नत में वर्णित उम्रा के तरीके को संक्षेप में बताएँगे।
अल्लाह तआला के यहाँ इबादत तब तक स्वीकार नहीं होती जब तक उसमें दो शर्तें पूरी न हों :
इसलिए जो व्यक्ति अल्लाह तआला की कोई इबादत करना चाहता है — चाहे वह उम्रा हो, या हज्ज हो या कोई और इबादत — उस पर वाजिब है कि वह उस इबादत में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े को सीखे; ताकि उसका काम सुन्नत के अनुसार हो।
इन पंक्तियों में हम सुन्नत में वर्णित उम्रा के तरीके को संक्षेप में बताएँगे।
उम्रा चार चीज़ों से मिलकर बनता है :
एहराम, बैतुल्लाह (पवित्र काबा) का तवाफ़, सफ़ा और मरवा के बीच सई, और बाल मुँडवाना या छोटे करवाना।
एहराम का अर्थ है (हज्ज या उम्रा की) इबादत में प्रवेश करने की नीयत करना।
जब कोई एहराम बाँधना चाहे तो सुन्नत यह है कि वह अपने सामान्य कपड़े उतार दे और जनाबत के ग़ुस्ल की तरह ग़ुस्ल करे, और कस्तूरी (मिस्क) या जो भी सबसे अच्छी खुशबू उपलब्ध हो, उसे अपने सिर और दाढ़ी में लगाए। एहराम बाँधने के बाद उस खुशबू का असर रह जाना नुकसानदेह नहीं है, जैसा कि सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि उन्होंने कहा : “जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एहराम बाँधना चाहते तो सबसे अच्छी खुशबू लगाते, और बाद में भी मैं उनके सिर और दाढ़ी में कस्तूरी की चमक देखती थी।” (सहीह बुख़ारी : 271, सहीह मुस्लिम: 1190)
एहराम के समय ग़ुस्ल करना पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए सुन्नत है, यहाँ तक कि निफ़ास वाली और मासिक धर्म वाली औरत के लिए भी। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अस्मा बिन्त उमैस रज़ियल्लाहु अन्हा को, जब उन्हें बच्चा पैदा हुआ, यह हुक्म दिया कि वह एहराम के समय ग़ुस्ल करें, कपड़ा (पैड) बाँध लें और एहराम बाँधें। इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1209) ने रिवायत किया है।
फिर ग़ुस्ल करने और खुशबू लगाने के बाद वह एहराम के कपड़े पहने। इसके बाद, अगर फ़र्ज़ नमाज़ का समय हो, तो मासिक धर्म और निफास वाली महिला के अलावा अन्य व्यक्ति फ़र्ज़ नमाज़ पढ़े, और अगर फ़र्ज़ का समय न हो तो वह वुज़ू की सुन्नत की नीयत से दो रकअत नमाज़ पढ़े। जब नमाज़ से फ़ारिग़ हो जाए, तो क़िबला की ओर मुँह करके एहराम बाँधे। तथा वह एहराम को उस समय तक विलंब कर सकता है जब तक वह अपनी सवारी (या गाड़ी) पर न सवार हो जाए और सफ़र के लिए तैयार न हो जाए। फिर वह मीक़ात से मक्का की ओर रवाना होने से पहले एहराम बाँध ले।
फिर वह कहे : ‘‘लब्बैका अल्लाहुम्मा बि-उमरह’’ (ऐ अल्लाह! मैं उम्रा के लिए हाज़िर हूँ)।
इसके बाद वह वही तल्बिया पढ़े जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पढ़ते थे, और वह यह है :
लब्बैका अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल-हम्दा वन्ने‘मता लका वल-मुल्क, ला शरीका लक।
इसी तरह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तल्बिया में ये शब्द भी थे : (लब्बैका इलाहल-हक़)
और इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु तल्बिया में ये शब्द बढ़ाते थे : (लब्बैका व सा’दैक, वल-ख़ैरु बि-यदैक, वर-रग़बाउ इलैक, वल-‘अमल) पुरुष तल्बिया को ऊँची आवाज़ से पढ़े, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “मेरे पास जिब्रील आए और उन्होंने मुझे हुक्म दिया कि मैं अपने साथियों और जो मेरे साथ हैं, उन्हें तल्बिया ऊँची आवाज़ से पढ़ने का आदेश दूँ।” इसे अल्बानी ने सहीह अबू दाऊद (हदीस संख्या : 1599) में सहीह कहा है।
तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फ़रमान भी है : “सबसे उत्तम हज्ज ऊँची आवाज़ से तल्बिया पढ़ना और क़ुर्बानी का ख़ून बहाना है।”
इसे अल्बानी ने “सहीह अल-जामे‘” (1112) में हसन कहा है।
अल-‘अज्ज का अर्थ है तल्बिया को ऊँची आवाज़ से पढ़ना, और अस-सज्ज का अर्थ है क़ुर्बानी के जानवरों का ख़ून बहाना।
महिला उतनी ही आवाज़ से तल्बिया पढ़े जितनी उसके पास वाली सुन सके। लेकिन यदि उसके पास कोई ऐसा पुरुष हो जो उसका महरम न हो, तो वह चुपचाप (धीमी आवाज़ में) तल्बिया पढ़े।
यदि एहराम बाँधने वाला व्यक्ति किसी ऐसी रुकावट से डरता हो जो उसे अपने नुसुक (इबादत) को पूरा करने से रोक सकती हो — जैसे बीमारी, दुश्मन, क़ैद (रोक दिया जाना) या कोई और कारण — तो उसके लिए उचित है कि एहराम के समय शर्त लगाए और यह कहे : “इन ह-ब-सनी हाबिसुन फ़-महिल्ली हैसो हबस-तनी” अर्थात : यदि कोई रुकावट मुझे मेरे नुसुक को पूरा करने से रोक दे — चाहे बीमारी हो, या देरी हो या कोई और कारण — तो मैं वहीं अपना एहराम खोल दूँगा जहाँ मुझे रोक दिया जाए।
क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़ुबाआ बिन्त ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हा को, जब वह बीमार थीं और एहराम बाँधना चाहती थीं, तो यह शर्त लगाने का आदेश दिया और फ़रमाया : “क्योंकि तूने जो शर्त लगाई है, वह तेरे रब के ज़िम्मे है।” इसे बुख़ारी (हदीस संख्या : 5089) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 1207) ने रिवायत किया है।
तो जब कोई शर्त लगा ले और वास्तव में कोई रुकावट आ गई जो उसे अपने नुसुक (हज्ज के कार्यों) को पूरा करने से रोक दे, तो वह अपने एहराम से बाहर आ जाएगा और उस पर कुछ भी (फ़िद्या आदि) अनिवार्य नहीं होगा।
लेकिन जो व्यक्ति किसी रुकावट से नहीं डरता, उसके लिए शर्त लगाना उचित नहीं है। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्वयं शर्त नहीं लगाई और न ही हर व्यक्ति को शर्त लगाने का आदेश दिया। बल्कि आपने यह आदेश केवल ज़ुबाआ बिन्त ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हा को उनकी बीमारी के कारण दिया था।
मोहरिम को चाहिए कि वह अधिक से अधिक तल्बिया पढ़े, विशेष रूप से हालात और समय के बदलने पर — जैसे ऊँचाई पर चढ़ते समय, नीचे उतरते समय, रात के आने पर या दिन के आने पर। और तल्बिया के बाद अल्लाह से उसकी रज़ामंदी और जन्नत माँगे, और उसकी रहमत के ज़रिये जहन्नम से पनाह माँगे।
उम्रा में तल्बिया एहराम से लेकर तवाफ़ शुरू करने तक धर्मसंगत है। जब तवाफ़ शुरू कर दे, तो तल्बिया बंद कर दे।
जब वह मक्का के क़रीब पहुँचे, तो उचित है कि उसमें प्रवेश करने के लिए ग़ुस्ल कर ले, यदि उसके लिए ऐसा करना संभव और आसान हो। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का में प्रवेश करते समय ग़ुस्ल किया था। (मुस्लिम : 1259)
जब वह मस्जिदे हराम में प्रवेश करे, तो दायाँ पैर आगे रखे और यह दुआ पढ़े : बिस्मिल्लाह, वस्सलातु वस्सलामु अला रसूलिल्लाह, अल्लाहुम्मग़्फ़िर ली ज़ुनूबी, वफ्तह ली अबवाबा रहमतिका, अऊज़ो बिल्लाहिल-अज़ीम, व बि-वज्हिहिल-करीम, व बि-सुल्तानिहिल-क़दीम मिनश-शैतानिर-रजीम।
फिर हज्रे अस्वद की ओर बढ़े ताकि तवाफ़ की शुरुआत करे। वह हज्रे अस्वद को अपने दाएँ हाथ से छुए और उसे चूमे।
यदि उसे चूमना संभव न हो, तो उसे हाथ से छुए और अपने हाथ को चूम ले (“इस्तिलाम” का अर्थ है हज्रे-अस्वद को हाथ से छूना)। यदि हाथ से छूना भी संभव न हो, तो हज्रे अस्वद की ओर मुँह करके हाथ से इशारा करे और अल्लाहु अकबर कहे, और अपने हाथ को न चूमे।
हज्रे अस्वद को छूने की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह क़ियामत के दिन हज्रे अस्वद को इस हाल में उठाएगा कि उसके दो आँखें होंगी जिनसे वह देखेगा, और एक ज़बान होगी जिससे वह बोलेगा, और वह उस व्यक्ति के हक़ में गवाही देगा जिसने उसे हक़ के साथ छुआ।” इसे अल्बानी ने सहीह अत-तरग़ीब वत-तरहीब (हदीस संख्या : 1144) में सहीह कहा है।
बेहतर यह है कि भीड़ में धक्का-मुक्की न करे, ताकि न लोगों को तकलीफ़ पहुँचाए और न खुद उनसे कष्ट उठाए। क्योंकि हदीस में आया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से फ़रमाया : “ऐ उमर! तुम एक ताक़तवर आदमी हो। इसलिए हज्रे अस्वद पर भीड़ मत लगाओ कि तुमसे कमज़ोर को तकलीफ़ पहुँचे। अगर तुम्हें (खाली) जगह मिले तो उसे छू लो। नहीं तो, उसकी ओर मुँह करके अल्लाहु अकबर कहो।” इसे अहमद (हदीस संख्या : 191) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इसे “मनासिक अल-हज्ज वल-उम्रह” (पृष्ठ : 21) में क़वी (मज़बूत) कहा है।
फिर वह दाईं ओर मुड़ जाए और का’बा को अपने बाएँ रखे। जब वह रुक्ने यमानी (जो हज्रे अस्वद के बाद तीसरा कोना है) पर पहुँचे तो उसे बिना चूमे और बिना अल्लाहु अकबर कहे छुए। यदि उसे छूना संभव न हो, तो आगे बढ़ जाए और उस पर भीड़ न करे। रुक्ने यमानी और हज्रे अस्वद के बीच यह दुआ पढ़े : ربنا آتنا في الدنيا حسنة وفي الآخرة حسنة وقنا عذاب النار “रब्बना आतिना फ़िद-दुन्या हसनह, व फ़िल-आख़िरति हसनह, व-क़िना ‘अज़ाबन्-नार।” इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इसे सहीह अबू दाऊद (1666) में हसन कहा है।
जब भी वह हज्रे अस्वद के पास से गुज़रे, उसकी ओर मुँह करके ‘अल्लाहु अकबर’ कहे।
जबकि अपने बाक़ी तवाफ़ में जो चाहे ज़िक्र, दुआ और क़ुरआन की तिलावत करे। क्योंकि तवाफ़ को अल्लाह तआला के ज़िक्र को क़ायम करने के लिए ही निर्धारित किया गया है।
इस तवाफ़ में पुरुष के लिए दो काम करना उचित है :
इज़्तिबा‘ का अर्थ है अपना दायाँ कंधा खुला रखना — इस तरह कि अपनी चादर का बीच वाला हिस्सा दाएँ बगल के नीचे से निकाल कर उसके दोनों सिरे बाएँ कंधे पर डाल दे। जब वह तवाफ़ से फारिग हो जाए, तो अपनी चादर को पहले जैसी स्थिति में लौटा ले, क्योंकि इज़्तिबा‘ केवल तवाफ़ के दौरान है।
जब वह तवाफ़ के सात चक्कर पूरे कर ले, तो अपना दायाँ कंधा ढक ले। फिर मक़ामे-इब्राहीम की ओर बढ़े और यह आयत पढ़े : وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى “और मक़ामे- इब्राहीम को नमाज़ की जगह बना लो।” फिर वह मक़ामे-इब्राहीम के पीछे दो रकअत नमाज़ पढ़े। पहली रकअत में सूरत फ़ातिहा के बाद ‘क़ुल या अय्युहल-काफ़िरून’ और दूसरी रकअत में फ़ातिहा के बाद ‘क़ुल हुवल्लाहु अहद’ पढ़े। फिर जब वह नमाज़ से फ़ारिग़ हो जाए, तो हज्रे-अस्वद के पास जाए और यदि संभव हो तो उसे छुए। यहाँ केवल छूना ही धर्मसंगत है। यदि छूना संभव न हो, तो आगे बढ़ जाए और उसकी ओर इशारा न करे।
फिर वह मस्आ (सई की जगह) की ओर निकले। जब वह सफ़ा के क़रीब पहुँचे, तो यह आयत पढ़े : إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ “निःसंदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं।” और कहे : “नब-दओ बिमा बदा-अल्लाहु बिहि” (हम उसी से शुरू करते हैं जिससे अल्लाह ने शुरू किया) फिर वह सफ़ा पर चढ़े, यहाँ तक कि काबा को देख ले। फिर काबा की ओर मुँह करे, अपने हाथ उठाए, अल्लाह की प्रशंसा करे और जो चाहे दुआ करे। यहाँ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दुआओं में से यह दुआ भी थी : “ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीका लहू, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु व हुवा अला कुल्लि शै’इन क़दीर। ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू, अंजज़ा वा’दहू, व न-स-रा अब्दहू, व हज़मल-अह़्ज़ाबा वह़्दहू।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1218) ने रिवायत किया है।
वह इस ज़िक्र को तीन बार दोहराए और हर बार के बीच दुआ करे। अर्थात् : वह पहले यह ज़िक्र कहे, फिर दुआ करे; फिर दूसरी बार यह ज़िक्र कहे, फिर दुआ करे; फिर तीसरी बार यह ज़िक्र कहे और मरवा की ओर उतर जाए — तीसरी बार के बाद दुआ न करे।
जब वह हरे निशान (ग्रीन लाइट) तक पहुँचे तो अपनी क्षमता भर तेज़ दौड़ लगाए, लेकिन किसी को तकलीफ़ न दे। क्योंकि यह साबित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सफ़ा और मरवा के बीच सई करते हुए फ़रमाते थे : “अबतह को दौड़ते हुए ही तय किया जाए।” इस हदीस को इब्न माजह ने रिवायत किया है और अल्बानी ने इसे सहीह इब्न माजह (हदीस संख्या : 2419) में सहीह कहा है।
‘अबतह’ से अभिप्राय वह दूरी है जो आज मौजूद दोनों हरे निशानों के बीच है।
फिर जब वह दूसरे हरे निशान तक पहुँच जाए, तो अपनी सामान्य चाल से चलता हुआ ‘मरवा’ तक पहुँचे। वहाँ वह उस पर चढ़े, क़िब्ला की ओर मुख करे, अपने हाथ उठाए और वही दुआ पढ़े जो उसने ‘सफ़ा’ पर पढ़ी थी।
फिर वह मरवा से उतरकर सफ़ा की ओर आए। जहाँ चलना है वहाँ चले और जहाँ दौड़ना है वहाँ दौड़े। जब वह सफ़ा पर पहुँचे, तो वही करे जो उसने पहली बार किया था। इसी तरह मरवा पर भी करे, यहाँ तक कि सात चक्कर पूरे कर ले। सफ़ा से मरवा जाना एक चक्कर है, और मरवा से सफ़ा लौटना दूसरा चक्कर। अपनी सई के दौरान वह जो चाहे ज़िक्र, दुआ और क़ुरआन की तिलावत करता रहे।
चेतावनी : अल्लाह तआला का यह कथन : إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَائِرِ اللَّهِ इसे सई करने वाला केवल सई की शुरुआत में, जब वह पहली बार सफ़ा के क़रीब पहुँचे, तब पढ़े। हर बार सफ़ा और मरवा के क़रीब आने पर इसे दोहराना मुस्तहब (सुन्नत) नहीं है, जैसा कि कुछ लोग करते हैं।
जब वह अपनी सई के सातों चक्कर पूरे कर ले, तो यदि पुरुष है तो अपना सिर मुँडवाए, या अपने बाल छोटे करवाए। लेकिन ध्यान रहे कि मुँडवाना पूरे सिर पर होना ज़रूरी है। इसी तरह बाल छोटे करवाने में भी सिर के सभी हिस्सों से बाल छोटे किए जाएँ।
सिर मुँडवाना, बाल छोटे करवाने से बेहतर है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुँडवाने वालों के लिए तीन बार दुआ की और बाल छोटे करवाने वालों के लिए एक बार। (मुस्लिम, हदीस संख्या : 1303)
जहाँ तक महिला का संबंध है, तो वह अपने बालों से उँगली के एक पोर के बराबर बाल काटेगी।
इन कार्यों के साथ उमरा पूरा हो जाता है। इस तरह उमरा : एहराम, तवाफ़, सई, और बाल मुँडवाने या छोटे करवाने का नाम है।
हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हमें नेक कामों की तौफ़ीक़ दे और उन्हें हमसे स्वीकार करे। निःसंदेह वह बहुत निकट है, दुआओं को स्वीकार करने वाला है।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर