जुमे के दिन (शुक्रवार) की सुन्नतें और आदाब

प्रश्न 13815

मुझे पता है कि जुमे के दिन (शुक्रवार) की बहुत-सी फ़ज़ीलतें हैं। क्या आप मुझे जुमे के दिन की कुछ सुन्नतें और आदाब (शिष्टाचार) बता सकते हैं, जिन्हें मैं इस दिन कर सकूँ?

उत्तर का सारांश

जुमे का दिन अत्यंत फ़ज़ीलत वाला दिन है। इसके बारे में बहुत-सी हदीसें आई हैं, जो इसकी फ़ज़ीलत को प्रमाणित करती हैं। इसकी प्रमुख सुन्नतों और आदाब में जुमे की नमाज़, सूरतुल-कह्फ़ का पाठ, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अधिक से अधिक दुरूद भेजना तथा दुआ में भरपूर प्रयास करना शामिल हैं।

उत्तर का पाठ

हाँ, जुमा का दिन बहुत ही श्रेष्ठ और फ़ज़ीलत वाला दिन है। इसके विषय में बहुत-सी हदीसें आई हैं, जो इसकी फ़ज़ीलत को प्रमाणित करती हैं। प्रश्न संख्या (9211) देखें।

जुमे की सुन्नतें और आदाब

जुमे की सुन्नतें और आदाब बहुत-से हैं, जिनमें से कुछ ये हैं :

  1. जुमे की नमाज़

अल्लाह तआला ने फ़रमाया :

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نُودِي لِلصَّلاةِ مِنْ يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَاسْعَوْا إِلَى ذِكْرِ اللَّهِ وَذَرُوا الْبَيْعَ ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ

الجمعة/9

"ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए तो अल्लाह के ज़िक्र की ओर दौड़ पड़ो और व्यापार छोड़ दो। यही तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो।" (सूरतुल-जुमुआ : 9)

इब्नुल-क़य्यिम रहिमहुल्लाह ‘ज़ादुल-मआद’ (1/376) में कहते हैं :

"जुमे की नमाज़ इस्लाम के सबसे अधिक ज़ोर देकर अनिवार्य किए गए फ़र्ज़ों में से है और मुसलमानों के सबसे बड़े जमावड़ों में से एक है। यह हर उस सभा से बड़ी है जिसमें मुसलमान इकट्ठा होते हैं (यानी मुसलमानों की सबसे महान सामूहिक इबादतों में से एक है।) और इसकी फ़र्ज़ियत अरफ़ात के जमावड़े के अलावा सबसे अधिक है। जो व्यक्ति इसकी परवाह न करते हुए इसे छोड़ देता है, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

अबू अल-जअद अज़-ज़िमरी — जिनको नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की संगति प्राप्त थी — से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जो व्यक्ति लापरवाही के कारण तीन जुमे छोड़ दे, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है।” इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 1052) ने रिवायत किया है और अल्बानी ने ‘सहीह अबी दाऊद’ (928) में इसे सहीह कहा है।

अब्दुल्लाह बिन उमर और अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हुम से वर्णित है कि दोनों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने मिंबर की लकड़ियों पर यह फ़रमाते हुए सुना : “कुछ लोग जुमा छोड़ने से अवश्य बाज़ आ जाएँ, अन्यथा अल्लाह उनके दिलों पर अवश्य मुहर लगा देगा, फिर वे निश्चित रूप से ग़ाफ़िल लोगों में से हो जाएँगे।”

इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 865) ने रिवायत किया है।

  1. दुआ में भरपूर प्रयास करना

इस दिन एक ऐसी घड़ी होती है कि यदि बंदा उस समय अपने रब से दुआ करे तो — अल्लाह तआला की अनुमति से — उसकी दुआ स्वीकार की जाती है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जुमे के दिन का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया : "इसमें एक ऐसी घड़ी होती है कि यदि कोई मुसलमान बंदा उस समय नमाज़ की अवस्था में अल्लाह से कोई भलाई माँगे, तो अल्लाह उसे अवश्य प्रदान करता है।" इसे बुखारी (हदीस संख्या : 893) और मुस्लिम (हदीस संख्या : 852) ने रिवायत किया है।

  1. सूरतुल-कह्फ़ का पाठ करना

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया :

"जो व्यक्ति जुमा के दिन सूरतुल-कह्फ़ पढ़े, उसके लिए उस जुमा से अगले जुमा तक नूर प्रकाशित कर दिया जाता है।"
इसे हाकिम ने रिवायत किया है और अल्बानी ने ‘सहीह अत-तरगीब’ (836) में इसे सहीह कहा है।

  1. रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अधिक से अधिक दुरूद भेजना

औस बिन औस रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमाया : “तुम्हारे सबसे श्रेष्ठ दिनों में से जुमे का दिन है। इसी दिन आदम अलैहिस्सलाम पैदा किए गए, इसी दिन उनकी मृत्यु हुई, इसी दिन सूर फूँका जाएगा और इसी दिन बेहोशी आएगी। अतः (इस दिन) मुझ पर अधिक से अधिक दुरूद भेजो, क्योंकि तुम्हारा दुरूद मेरे सामने पेश किया जाता है।” सहाबा ने कहा : “ऐ अल्लाह के रसूल! हमारा दुरूद आप पर कैसे पेश किया जाएगा, जबकि आप तो मिट चुके होंगे — अर्थात वे कह रहे थे कि आपका शरीर पुराना होकर गल चुका होगा?” आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “निश्चय ही अल्लाह ने धरती पर नबियों के शरीरों को खाने को हराम कर दिया है।” इसे अबू दाऊद (हदीस संख्या : 1047) ने रिवायत किया है। इब्नुल-क़य्यिम ने ‘सुनन अबी दाऊद’ पर अपनी टिप्पणी (4/273) में इसे सहीह कहा है और अल्बानी ने ‘सहीह अबी दाऊद’ (925) में इसे सहीह कहा है।

‘औनुल-मा’बूद’ में कहा गया है :

“केवल जुमे के दिन को विशेष रूप से इसलिए चुना गया है क्योंकि जुमे का दिन दिनों का सरदार है और मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सभी इंसानों के सरदार हैं। इसलिए इस दिन आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजने की ऐसी विशेषता है जो दूसरे दिनों को प्राप्त नहीं।” उद्धरण समाप्त हुआ।

इन फ़ज़ीलतों और इबादतों के साथ-साथ, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जुमे के दिन या उसकी रात को किसी ऐसी विशेष इबादत के लिए निर्धारित करने से मना किया है जो शरीअत में वर्णित नहीं है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “तुम रातों में से सिर्फ़ जुमे की रात को क़ियाम (तहज्जुद, रात की नमाज़) के लिए ख़ास न करो, और न ही दिनों में से सिर्फ़ जुमे के दिन को रोज़े के लिए ख़ास करो, सिवाय इसके कि वह किसी ऐसे रोज़े का हिस्सा हो जिसे तुममें से कोई व्यक्ति रखता हो।” इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 1144) ने रिवायत किया है।

इमाम सनआनी ने ‘सुबुलुस्सलाम’ में कहा :

“यह हदीस जुमे की रात को इबादत के लिए विशेष रूप से निर्धारित करने और सामान्य रूप से न की जाने वाली तिलावत को उसके लिए विशेष करने की मनाही का प्रमाण है, सिवाय उस चीज़ के जिसके बारे में कोई नस (शरई प्रमाण) आया हो, जैसे सूरतुल-कह्फ़ पढ़ना...” उद्धरण समाप्त हुआ।

इमाम नववी ने कहा :

“इस हदीस में जुमे की रात को दूसरी रातों के बीच विशेष रूप से नमाज़ के लिए और उसके दिन को रोज़े के लिए विशेष रूप से निर्धारित करने की स्पष्ट मनाही है। और इसके मकरूह होने पर विद्वानों की सहमति है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

उन्होंने यह भी कहा :

विद्वानों ने कहा : “जुमे के दिन को रोज़े के लिए विशेष करने से मनाही की हिकमत यह है कि जुमे का दिन दुआ, ज़िक्र और इबादत का दिन है : ग़ुस्ल करने और (मस्जिद में) जल्दी जाने से लेकर नमाज़ तक, उसकी प्रतीक्षा करने, ख़ुत्बा सुनने और उसके बाद अधिक से अधिक ज़िक्र करने तक; क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है :

فَإِذَا قُضِيَتْ الصَّلاةُ فَانْتَشَرُوا فِي الأَرْضِ وَابْتَغُوا مِنْ فَضْلِ اللَّهِ وَاذْكُرُوا اللَّهَ كَثِيرًا

“फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए तो धरती में फैल जाओ और अल्लाह का फ़ज़्ल तलाश करो और अल्लाह को बहुत अधिक याद करो।” और इसके अलावा भी उस दिन कई इबादतें होती हैं। इसलिए इस दिन रोज़ा न रखना पसंद किया गया है, ताकि इन धार्मिक कार्यों को करने और उन्हें उत्साह, प्रसन्नता और खुले दिल के साथ अदा करने में वह व्यक्ति अधिक सक्षम रहे तथा बिना ऊब और थकान के इनसे आनंद प्राप्त करे। यह उस हाजी के समान है जो अरफ़ा के दिन अरफ़ात में हो, क्योंकि इस हिकमत के कारण उसके लिए सुन्नत यह है कि वह रोज़ा न रखे... यही जुमे के रोज़े को अकेले विशेष करने की मनाही की हिकमत के बारे में मान्य मत है।”

एक मत यह भी है किः जुमे के दिन विशेष रूप से रोज़ा रखने से मनाही का कारण यह भय है कि कहीं उसकी महत्ता बढ़ाने में अतिशयोक्ति न हो जाए, इस हद तक कि लोग उसके कारण किसी फ़ितने में पड़ जाएँ, जैसा कि कुछ लोग शनिवार के मामले में फ़ितने में पड़ गए थे। लेकिन यह मत कमज़ोर है, क्योंकि जुमे की नमाज़ और जुमे के दिन से संबंधित अन्य प्रसिद्ध धार्मिक कार्य तथा उसकी ता’ज़ीम (महत्ता और सम्मान) इस मत के विरुद्ध हैं।

एक और मत यह है किः मनाही का कारण यह है कि कहीं लोग जुमे के दिन रोज़ा रखने को अनिवार्य न समझ बैठें। लेकिन यह मत भी कमज़ोर है और इससे भी आपत्ति होती है, क्योंकि सोमवार के दिन रोज़ा रखना मुस्तहब (पसंदीदा) है, फिर भी इस दूर की संभावना को ध्यान में नहीं रखा जाता कि लोग उसे अनिवार्य समझ लेंगे। इसी तरह अरफ़ा के दिन और आशूरा के दिन रोज़ा रखने का मामला है तथा अन्य दिनों का भी। अतः सही बात वही है जिसका हमने पहले उल्लेख किया है।” उद्धरण समाप्त हुआ।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक जानने वाला है।

संदर्भ

जुमा की नमाज़

स्रोत: 

साइट इस्लाम प्रश्न और उत्तर

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