इमाम अहमद का प्रसिद्ध मत, और कई विद्वानों की पसंद यह है कि सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले व्यक्ति की नमाज़ सही नहीं है।
इस मुद्दे के बारे में आदरणीय शैख इब्न उसैमीन (रहिमहुल्लाह) से पूछा गया, तो उन्होंने इसका विस्तृत उत्तर देते हुए कहा :
‘‘इस मुद्दे पर बातचीत दो भागों में बंटी हुई है :
पहला भाग : क्या सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले की नमाज़ सही है या नहीं?
दूसरा भाग : यदि हम कहें कि यह सही नहीं है, और सफ़ पूरी हो चुकी हो, तो वह व्यक्ति क्या करे?
जहाँ तक पहले भाग की बात हैं : तो विद्वानों (रहिमहुमुल्लाह) ने इस मामले में मतभेद किया है :
कुछ विद्वानों ने कहा : सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले व्यक्ति की नमाज़ सही है, चाहे उसके पास कोई कारण हो या न हो। लेकिन उनमें से कुछ ने स्पष्ट रूप से बिना कारण के इसे मकरूह (अवांछित) कहा है। यही तीनों इमामों : मालिक, शाफ़ेई और अबू हनीफ़ा रहिमहुमुल्लाह का मत है।
उन्होंने सफ़ के पीछे अकेली महिला के नमाज़ पढ़ने के सही होने को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है, यह तर्क देते हुए कि शरीयत के नियमों के मामले में पुरुष और महिला एक समान हैं।
उन्होंने यह भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अबू बकरह रज़ियल्लाहु अन्हु को सफ़ में शामिल होने से पहले रुकू करने पर अपनी नमाज़ दोहराने का निर्देश नहीं दिया था [अबू बकरह की हदीस को बुखारी (हदीस संख्या : 783) ने रिवायत की है]।
और उन्होंने यह भी प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नमाज़ के दौरान इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा को अपने पीछे से घुमाया था। [बुखारी, हदीस संख्या : 117 और मुस्लिम, हदीस संख्या : 763]। अतः अगर नमाज़ के एक हिस्से में अकेले नमाज़ पढ़ना जायज़ है, तो फिर पूरी नमाज़ में भी अकेले नमाज़ पढ़ना जायज़ है। क्योंकि अगर अकेले नमाज़ पढ़ने से नमाज़ अमान्य हो जाती, तो उसके कम और ज़्यादा में कोई फ़र्क़ नहीं होता, जैसे इमाम के सामने खड़े होने के मुद्दे में है।
उन्होंने उन हदीसों का जो सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने की वैधता को नकारती हैं, यह जवाब दिया है कि वे हदीसें नमाज़ की पूर्णता को नकारती हैं। अतः यह पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के इस कथन के समान है : "खाने की उपस्थिति में कोई नमाज़ नहीं है।" [मुस्लिम, हदीस संख्या : 560], और इसी आशय की अन्य हदीसें।
जबकि कुछ विद्वानों ने कहा : सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले व्यक्ति की नमाज़ सही नहीं होती। यह इमाम अहमद का उनके अनुयायियों के निकट प्रसिद्ध मत है, और यह उनके विशिष्ट विचारों में से एक है। उनकी एक दूसरी रिवायत भी है, जो तीनों इमामों की राय के अनुकूल है, कि सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले आदमी की नमाज़ सही होती है।
इस कथन के समर्थक हदीस और तर्क दोनों से प्रमाण स्थापित करते हैं :
हदीस से प्रमाण : यह है कि इमाम अहमद (हदीस संख्या : 15862) ने अली बिन शैबान रज़ियल्लाहु अन्हु के हवाले से रिवायत किया है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को सफ़ के पीछे (अकेले) नमाज़ पढ़ते देखा। जब उस व्यक्ति ने नमाज़ समाप्त की, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे कहा : "अपनी नमाज़ दोहराओ, क्योंकि सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले की नमाज़ नहीं है।" यह एक हसन हदीस है और इसके समर्थन में अन्य रिवायतें भी हैं जो इसकी प्रामाणिकता की अपेक्षा करती हैं।
तर्क से प्रमाण : जहाँ तक तर्क की बात है तो जमाअत का मतलब है जमावड़ा और इकट्ठा होना। यह जमावड़ा स्थान और कर्म दोनों के माध्यम से होता है। कर्म से इस प्रकार कि मुक़तदी लोग अपने इमाम का अनुसरण करने के लिए इकट्ठा होते हैं, और स्थान से इस प्रकार कि वे सफों में खड़े होते हैं। अगर हम कहें कि उनका अलग-अलग खड़ा होना जायज़ है, तो जमाअत की शक्ल ही खत्म हो जाएगी।
इन लोगों ने उन विद्वानों के प्रमाणों का, जो सफ़ के पीछे अकेले खड़े होकर नमाज़ पढ़ने को जायज़ मानते हैं, उत्तर देते हुए कहा : स्त्री का पुरुषों की सफ़ों के पीछे अकेले खड़े होने की वैधता सुन्नत से सिद्ध है कि यह उसकी विशेषताओं में से है। जैसा कि अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है, वह कहते हैं : "मैं और एक अनाथ आपके पीछे – यानी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे - खड़े हुए और बुज़ुर्ग महिला हमारे पीछे खड़ी हुई।” [इसे बुखारी, हदीस संख्या : 234 और मुस्लिम, हदीस संख्या : 658 ने रिवायत किया है।]। तथा इसलिए भी कि स्त्री इस योग्य नहीं है कि वह (एक ही सफ़ में) पुरुषों के बगल में खड़ी हो।
जहाँ तक अबू बकरह रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस का संबंध है, तो वह केवल थोड़े समय के लिए अकेले खड़े थे, और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहा था : "ऐसा दोबारा मत करना।"
जहाँ तक इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की हदीस का संबंध है, तो वह सफ़ के पीछे नहीं खड़े हुए, बल्कि बिना रुके चलते हुए पीछे से गुजरे थे।
रही बात उनके यह कहने की, कि : “नमाज़ के न होने” से अभिप्राय “नमाज़ की पूर्णता का न होना” है, तो यह दावा खंडित और अस्वीकार्य है ; क्योंकि निषेध का मूल अर्थ अस्तित्व का निषेध होता है। यदि ऐसा संभव नहीं है, तो यह वैधता का निषेध होता है। यदि यह भी संभव नहीं है, तो यह पूर्णता का निषेध होता है। जबकि हदीस : "अकेले नमाज़ पढ़ने वाले की कोई नमाज़ नहीं होती" में निषेध से अभिप्राय नमाज़ की वैधता का निषेध लेना संभव है, इसलिए यही अर्थ मुराद लिया जाना चाहिए।
जहाँ तक उनका इस हदीस से तुलना करने का संबंध है कि : “खाने की उपस्थिति में कोई नमाज़ नहीं”, तो यह तुलना दो कारणों से सही नहीं है :
पहला कारण : इसका कारण भोजन की मौजूदगी में हृदय का व्यस्त होना है, और दिल का व्यस्त होना नमाज़ को अमान्य नहीं करता। जैसा कि वसवसे (शैतानी ध्यान भटकाव) की हदीस में है कि शैतान नमाज़ी के पास आता है और कहता है : “फलाँ बात याद करो, फलाँ बात याद करो”, यहाँ तक कि उसे पता ही नहीं रहता कि उसने कितनी रकअतें पढ़ीं।” (बुख़ारी, हदीस संख्या : 608, मुस्लिम, हदीस संख्या : 389)।
दूसरा कारण : हदीस “सफ़ के पीछे अकेले खड़े होकर नमाज पढ़ने वाले की कोई नमाज़ नहीं” में स्वयं स्पष्ट कर दिया गया है कि इससे अभिप्राय नमाज़ का सही न होना है; क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस व्यक्ति को नमाज़ दोहराने का आदेश दिया और इसका कारण बताया कि सफ़ के पीछे अकेले खड़े होने वाले व्यक्ति की नमाज़ नहीं होती।
तथा वाबिसा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक आदमी को सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ते देखा, तो उसे नमाज़ दोहराने का आदेश दिया। (अबू दाऊद : 682, तिर्मिज़ी : 230)
इससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रबल (राजेह) मत यह है कि सफ़ में मिलकर खड़ा होना अनिवार्य (वाजिब) है, और जो व्यक्ति सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़े, उसकी नमाज़ अमान्य है, और उसे उस नमाज़ को दोहराना होगा, क्योंकि उसने सफ़ में खड़े होने का वाजिब छोड़ दिया।
लेकिन यह वाजिब अन्य वाजिबों की तरह है; वह उस स्थिति में समाप्त हो जाता है जब उसका अवसर निकल जाए, या उस पर शरई असमर्थता हो, या वास्तविक (शारीरिक) असमर्थता हो। क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है : فَاتَّقُوا اللَّهَ مَا اسْتَطَعْتُم “अतः जितना हो सके अल्लाह से डरते रहो।” (सूरत अत-तग़ाबुन : 16)।
तथा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया : “जब मैं तुम्हें किसी बात का आदेश दूँ, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार पूरा करो।” (बुख़ारी : 7288, मुस्लिम : 1337)
अतः व्यक्ति को उसी सफ़ में खड़ा होना चाहिए जहाँ भी उसे स्थान मिले। यदि उसे कोई स्थान न मिले, तो यह वाजिब उससे समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार, यदि शरई कारण से उसके लिए सफ़ में खड़ा होना संभव न हो, तो भी यह वाजिब उससे समाप्त हो जाता है।
पहले मामले का उदाहरण : यदि सफ़ पूरी हो गई है, तो उसके लिए अकेले नमाज़ पढ़ना जायज़ है; क्योंकि असमर्थता की स्थिति में कोई वाजिब नहीं रहता।
दूसरे मामले का उदाहरण : यदि कोई महिला पुरुषों के साथ नमाज़ पढ़ रही है, तो वह सफ़ के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ेगी, जैसा कि सुन्नत से सिद्ध है। और यह बात जो सुन्नत से सिद्ध है, वही उस पुरुष के लिए भी मूल सिद्धांत बन सकती है जो सफ में जगह न पाए; क्योंकि वास्तविक (भौतिक) असमर्थता शरई असमर्थता के समान है।
इसकी और व्याख्या यह है कि यदि कोई पुरुष (मस्जिद) आए और देखे कि पंक्ति पूरी भरी हुई है, तो उसके सामने चार विकल्प होते हैं :
- आगे बढ़कर इमाम के बगल में खड़ा हो जाए।
- पंक्ति से किसी को खींचकर अपने साथ खड़ा कर ले।
- जमाअत छोड़कर अकेले नमाज़ पढ़े।
- जमाअत के साथ पंक्ति के पीछे नमाज़ पढ़े।
पहला विकल्प (इमाम के बगल में खड़ा होना) इन कारणों से अनुचित है:
- यह सुन्नत के विरुद्ध है, क्योंकि इमाम को आगे रखकर उसे स्थान और क्रियाओं में नमाज़ियों से अलग किया जाता है।
और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के बगल में खड़ा होना (मुस्लिम : 413) इसका विरोध नहीं करता; क्योंकि जो आए और खड़े हुए, वह स्वयं इमाम आए और अपने नायब के पास खड़े हुए थे। साथ ही अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के लिए पीछे लौटना संभव नहीं था। और जमाअत की भलाई इसी में थी कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास रहें ताकि आपकी तकबीर लोगों तक पहुँचाएं। - इसमें उन लोगों को तकलीफ़ होगी जिनकी पंक्तियों को पार करके वह इमाम तक पहुँचेगा।
- इसमें उस व्यक्ति के लिए पंक्ति बनाने का अवसर नष्ट हो जाता है जो उसके बाद आता; क्योंकि यदि वह अकेला खड़ा रहता और कोई और व्यक्ति आता, तो वे दोनों मिलकर एक पंक्ति बना सकते थे।
दूसरा विकल्प (किसी को खींचकर अपने साथ खड़ा करने) में तीन आपत्तियाँ है :
- इससे पंक्ति में खाली जगह बनती है, जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पंक्तियों में सट कर खड़े होने का आदेश दिया और शैतान के लिए जगह छोड़ने से मना किया है। (अहमद : 5691, अबू दाऊद : 666, अल्बानी ने ”सहीहा” में सहीह कहा है।)
- इसमें खींचे गए व्यक्ति पर ज़ुल्म है, क्योंकि उसे बेहतर स्थान से कमतर स्थान पर ले जाया जाता है।
- इससे उसकी नमाज़ में खलल पड़ता है, और संभव है कि नमाज़ के बाद झगड़ा या गाली-गलौज तक हो जाए।
जो यह हदीस बयान की जाती है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने पंक्ति के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले से कहा : “क्या तुम उनके साथ शामिल नहीं हो सकते थे या किसी को खींच नहीं सकते थे?” तो यह हदीस कमज़ोर है और इससे कोई दलील स्थापित नहीं होती। (इसे तबरानी ने ‘अल-अवसत’ 8/374 में रिवायत किया है और हैसमी ने कहा : यह बहुत कमज़ोर है)
तीसरा विकल्प (जमाअत छोड़कर अकेले नमाज़ पढ़ना) — यह जमाअत की नमाज़ जैसे वाजिब को छोड़ना है जबकि उस पर क्षमता मौजूद है, इसलिए यह गुनाह में पड़ना है।
चौथा विकल्प (जमाअत के साथ पंक्ति के पीछे नमाज़ पढ़ना) — यही उसकी क्षमता के अनुसार वाजिब को पूरा करना है। क्योंकि जमाअत में नमाज़ पढ़ने वाले पर दो बातें अनिवार्य होती हैं :
- जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना
- पंक्ति में खड़ा होना
यदि इनमें से एक संभव न हो, तो दूसरी अनिवार्य हो जाती है।
यदि कहा जाए कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन: “पंक्ति के पीछे अकेले नमाज़ पढ़ने वाले की कोई नमाज़ नहीं।” सामान्य है और इसमें पंक्ति पूरी होने या न होने का कोई उल्लेख नहीं है।
तो इसका उत्तर यह है कि : यह उस व्यक्ति की नमाज़ के अमान्य होने को दर्शाता है जिसने पंक्ति में खड़े होने का वाजिब छोड़ा। लेकिन जब वह उस में सक्षम न हो, तो वह वाजिब उससे समाप्त हो जाता है। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी ऐसे काम के छोड़ने पर नमाज़ को अमान्य नहीं ठहराते जो व्यक्ति की क्षमता से बाहर हो।
इसी के समान नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन है : “उसकी कोई नमाज़ नहीं जिसने सूरत फातिहा न पढ़ी।” (इसे बुख़ारी : 756 और मुस्लिम : 394 ने रिवायत किया है)
और आप – सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - का यह कथन भी है : “उसकी कोई नमाज़ नहीं जिसके पास वुज़ू नहीं।” (इसे अहमद : 9137, अबू दाऊद : 101, इब्न माजा : 399 ने रिवायत किया है।) यदि यह सही हो। तो जो व्यक्ति फातिहा पढ़ने या वुज़ू करने में सक्षम न हो, वह इनके बिना ही नमाज़ पढ़ेगा और उसकी नमाज़ मान्य होगी। लेकिन वह फातिहा के बराबर कुरआन पढ़ेगा, या यदि कुरआन न पढ़ सके तो अल्लाह का ज़िक्र करेगा, और यदि वुज़ू न कर सके, तो तयम्मुम करेगा।
उत्तर का सारांश :
सफ़ (पंक्ति) में मिलकर खड़ा होना वाजिब है। और जो व्यक्ति आए और पाए कि पंक्ति पूरी हो चुकी है, तो वह जमाअत के साथ पंक्ति के पीछे नमाज़ पढ़े।
वह न तो इमाम के पास आगे बढ़े, न पंक्ति से किसी को खींचे, और न जमाअत की नमाज़ छोड़े।
किसी उज़्र (शरई कारण) के चलते, सफ़ से बाहर अकेले होकर जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने की अनुमति — शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया, हमारे शैख़ अब्दुर्रहमान अस-सा’दी, और कुछ उन विद्वानों का भी मत है जो सामान्य रूप से इसकी अनुमति के क़ायल हैं।
“मजमूओ फ़तावा व रसाइल अल-उसैमीन” (15/186)
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।