हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए
योग्य है।
शैखुल इस्लाम ने फरमाया : आशूरा के दिन का रोज़ा
एक साल का कफ्फारा है, और अकेले उसी दिन का रोज़ा रखना मकरूह (नापसंदीदा) नहीं है .
. . अल फतावा अल कुब्रा, भाग 5.
इब्ने हजर अल हैतमी की किताब "तोहफतुल
मुहताज" में है कि : अकेले आशूरा का रोज़ा रखने में कोई पाप नहीं है। भाग 3, अध्याय
: स्वैच्छिक रोज़ा।
तथा इफ्ता (फत्वा जारी करने) की स्थायी समिति
से यही प्रश्न किया गया तो उसने निम्नलिखित उत्तर दिया :
"आशूरा का केवल एक दिन रोज़ा रखना जाइज़
है, किंतु सर्वश्रेष्ठ उसके
एक दिन पहले या उसके एक दिन बाद का भी रोज़ा रखना है, और यही नबी सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम से आपके इस फरमान के द्वारा प्रमाणित सुन्नत है : "यदि मैं अगले
वर्ष तक जीवित रहा तो नवें मुहर्रम का (भी) रोज़ा रखूँगा।" (सहीह मुस्लिम हदीस
संख्या : 1134)
इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने फरमाया:
(अर्थात् दसवें मुहर्रम के साथ)।
और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान करने वाला
(शक्ति का स्रोत) है।